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हिंदी साहित्य का इतिहास आदिकालीन कवि सरहपा

  ​हिंदी साहित्य का इतिहास आदिकालीन कवि सरहपा  ​ नाम एवं अन्य नाम: इनका मूल नाम सरहपाद था, जिन्हें 'सरोजवज्र' और 'राहुलभद्र' के नाम से भी जाना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, 'सर' (बाण) बनाने वाली एक कन्या के संपर्क में आने और उससे प्रभावित होने के कारण इनका नाम 'सरहपा' पड़ा। ​ समय: महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने शोध के आधार पर इनका समय 769 ई. (8वीं शताब्दी) स्थिर किया है, जो हिंदी साहित्य के इतिहास में सर्वमान्य माना जाता है। ​ जन्म एवं शिक्षा: इनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इन्होंने उस समय के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। साधना के क्षेत्र में इन्होंने बौद्ध धर्म की 'वज्रयान' शाखा को चुना और सिद्ध कहलाए। ​ धार्मिक दर्शन: वे राजा धर्मपाल के समकालीन थे। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पारंपरिक ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का त्याग कर सहजयान का प्रवर्तन किया, जो सहज साधना और आंतरिक शुद्धि पर बल देता था। ​ व्यक्तित्व: सरहपा एक विद्रोही और क्रांतिकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने किताबी ज्ञान के स्थान पर '...

प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना

प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना पर प्रकाश डालिए। ​ प्रस्तावना (Introduction) ​हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर 'कथा सम्राट' (Emperor of Stories) और 'उपन्यास सम्राट' के रूप में देदीप्यमान मुंशी प्रेमचंद केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम (Indian Freedom Struggle) के एक मूक सिपाही और युगद्रष्टा थे। साहित्य को "जीवन की आलोचना" (Criticism of Life) मानने वाले प्रेमचंद ने अपनी कलम को ही अपना हथियार बनाया। जब हम उनकी कहानियों का समग्र मूल्यांकन करते हैं, तो उनमें राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) का स्वर सबसे अधिक मुखर, व्यापक और प्रखर दिखाई देता है। ​प्रेमचंद का युग (1880-1936) भारतीय इतिहास में एक भयंकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल का काल था। यह वह समय था जब भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद (British Imperialism) की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। ऐसे में प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे जनता में देशभक्ति (Patriotism) और सांस्कृतिक जागरण (Cultural Awakening) का शंखनाद बन गईं। इस विस्तृत आलेख म...

मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में दलित जीवन संबंधी विचार: एक आलोचनात्मक विश्लेषण

मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में दलित जीवन संबंधी विचार: एक आलोचनात्मक विश्लेषण ​ प्रस्तावना (Introduction) ​हिन्दी साहित्य के 'उपन्यास सम्राट' (Emperor of Novels) मुंशी प्रेमचंद केवल एक कथाकार नहीं थे, बल्कि वे अपने युग के सबसे महान समाजशास्त्री (Sociologist) , युगद्रष्टा और मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। साहित्य को "जीवन की आलोचना" (Criticism of Life) मानने वाले प्रेमचंद ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय समाज की उन गहरी खाइयों को उजागर किया, जिन्हें सदियों से धर्म और परंपरा के नाम पर ढंका गया था। जब हम प्रेमचंद के साहित्य का समग्र मूल्यांकन करते हैं, तो उसमें समाज के सबसे निचले, शोषित और हाशिए पर खड़े वर्ग—अर्थात 'दलित समाज'—का चित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाता है। ​प्रेमचंद के दलित जीवन संबंधी विचारों का अध्ययन करते समय यह समझना आवश्यक है कि उनका दृष्टिकोण जड़ या स्थिर नहीं था, बल्कि वह समय और समाज के विकास के साथ निरंतर परिपक्व होता गया। उन्होंने अपने साहित्य की शुरुआत "आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद" (Idealistic Realism) से की थी, जहाँ हृदय परि...

IGNOU MHD 12 भारतीय कहानी दीदी Bharteey Kahani Didi

इस ब्लॉग में हम इग्नू एम ए हिंदी की द्वितीय वर्ष में निर्धारित पाठ्यक्रम MHD 12 भारतीय कहानियां के अंतर्गत दीदी नामक कहानी का कथासार प्रस्तुत करेंगे यह कहानी मलयालम भाषा की कहानी है जिसके लेखक एम टी वासुदेवन नायर जी है इस कहानी का हिंदी अनुवाद वी दी कृष्णन नम्पियार जी ने किया है । यह एक बहुत ही मार्मिक कहानी है IGNOU MHD 12 भारतीय कहानी दीदी Bharteey Kahani Didi 'दीदी' कहानी का कथानक   कहानी के पात्र :  अप्पू (4 साल का बच्चा), दीदी (अप्पू की माँ ), नानी (दीदी की मां ), अप्पू के मामा, शंकरन नायर  कथानक अप्पू एक 5-6  साल का बच्चा है जिसका जन्म उसकी मां की कोख से विवाह से पहले हुआ है इसलिए नानी दीदी को बहुत भला बुरा कहकर ताने मारती है और अप्पू और दीदी को भी खूब गालियां देती है जिस कारण अप्पू नानी को पसंद नहीं करता है।  अप्पू की नानी उसे अपनी मां को दीदी के नाम से पुकारना सिखा देती है । अप्पू अपनी मां को दीदी के नाम से पुकारने लगता है और वह दीदी से बेहद प्रेम करता है। अप्पू की दीदी भी अप्पू से बहुत प्यार करती है और उसका बहुत ख्याल रखती है और अपने अतीत को...

काव्य हेतु लक्षण एवं प्रयोजन Kavya Hetu Lakshan Evam Prayojan

                         इस पोस्ट के माध्यम से आप  काव्य-हेतु  क्या है ? भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों ने कितनें काव्य हेतु मानें हैं ? और उनकी क्या परिभाषा दी है ? आदि प्रश्नों के उत्तर दे पाएंगे। काव्य हेतु लक्षण एवं प्रयोजन । शिक्षा विचार । Kavya Hetu Lakshan Evam Prayojan । Shiksha Vichar काव्य हेतु    विश्व में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसके पीछे कारण न हो अर्थात् कारण के बिना कार्य हो ही नहीं सकता। जब प्रत्येक वस्तु के उत्पादन में अवश्य ही कोई न कोई कारण होता है तो फिर साहित्य में कारण का अभाव क्यों ? साहित्य को जीवन की अभिव्यक्ति माना गया है। अतः जिस वस्तु का जीवन से इतना घनिष्ठ संबंध है। उसके आरंभ में कारण न हो यह असंभव है। काव्य अथवा साहित्य के कारणों को विभिन्न नामों से पुकारा गया है आज कारण के लिए हेतु शब्द का प्रयोग अधिक किया जाता है और अब यह रुढ़ भी हो चुका है। अतः हेतु का अभिप्राय उन साधनों से है जो कवि के काव्य रचना में सहायक होते हैं। काव्य-हेतु क्या है ?  इस विषय पर अनेक भारत...

काव्य लक्षण और परिभाषा Kavya Lakshan Aur Paribhasha

कविता की  परिभाषा क्या है ? उसके लक्षण क्या है ? इस पर प्राचीन काल से ही विभिन्न विद्वानों ने चिंतन-मनन कर उत्तर देने का प्रयास किया है। इस पोस्ट में संस्कृत आचार्यों से लेकर आधुनिक और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा जो  काव्य के लक्षण बताए गए हैं। उनको प्रस्तुत किया गया है। उम्मीद है यह पोस्ट कविता के संदर्भ में आपकी समझ को विकसित करनें में सहयोग करेगा। काव्य लक्षण और परिभाषा । शिक्षा विचार । Kavya Lakshan Aur Paribhasha । Shiksha Vichar  काव्य-लक्षण काव्य का लक्षण अथवा परिभाषा क्या है ? इसे मानसिक आधार पर अव्याप्ति तथा अतिव्याप्ति दोषों से रहित यथावत् प्रस्तुत करना अति कठिन है। प्राचीन काल से ही काव्यशास्त्रियों ने इसे अपने-अपने युग में तर्क की कसौटी पर कसा तथा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इसका उत्तर देने का प्रयास किया, परंतु फिर भी इसमें किसी न किसी बात के कारण वह खरापन नहीं आ पाता है जिसकी अपेक्षा की जाती है। उनमें कोई-न-कोई असमानता दिखाई देती है और उनमें न्यूनाधिक भेद की झलक पड़ती है। क्योंकि किसी विशेष विद्वान की परिभाषा सार्वकालिक नहीं होती अपितु वह अपने ही युग की आवाज ...