हिंदी साहित्य का इतिहास आदिकालीन कवि सरहपा
- नाम एवं अन्य नाम: इनका मूल नाम सरहपाद था, जिन्हें 'सरोजवज्र' और 'राहुलभद्र' के नाम से भी जाना जाता है। जनश्रुति के अनुसार, 'सर' (बाण) बनाने वाली एक कन्या के संपर्क में आने और उससे प्रभावित होने के कारण इनका नाम 'सरहपा' पड़ा।
- समय: महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने शोध के आधार पर इनका समय 769 ई. (8वीं शताब्दी) स्थिर किया है, जो हिंदी साहित्य के इतिहास में सर्वमान्य माना जाता है।
- जन्म एवं शिक्षा: इनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इन्होंने उस समय के प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। साधना के क्षेत्र में इन्होंने बौद्ध धर्म की 'वज्रयान' शाखा को चुना और सिद्ध कहलाए।
- धार्मिक दर्शन: वे राजा धर्मपाल के समकालीन थे। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पारंपरिक ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का त्याग कर सहजयान का प्रवर्तन किया, जो सहज साधना और आंतरिक शुद्धि पर बल देता था।
- व्यक्तित्व: सरहपा एक विद्रोही और क्रांतिकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने किताबी ज्ञान के स्थान पर 'स्वानुभूति' (स्वयं के अनुभव) को सर्वोच्च महत्व दिया। 84 सिद्धों में उनका स्थान सबसे प्राचीन और अग्रणी है।
साहित्यिक योगदान
- हिंदी के प्रथम कवि: सरहपा को हिंदी का 'आदि कवि' कहा जाता है। उनकी रचनाओं में पहली बार अपभ्रंश से हटकर लोकभाषा (पुरानी हिंदी) के लक्षण मिलते हैं, जिसने भविष्य की हिंदी भाषा की नींव रखी।
- दोहा-चौपाई पद्धति के जनक: हिंदी साहित्य को सरहपा की सबसे महत्वपूर्ण देन 'दोहा-चौपाई' (कड़वक) शैली है। इसी काव्य पद्धति को आगे चलकर सूफी कवि जायसी और रामभक्त कवि तुलसीदास ने अपने अमर महाकाव्यों (पद्मावत और रामचरितमानस) का आधार बनाया।
- दोहाकोश की रचना: उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक कृति 'दोहाकोश' है। इसमें संकलित दोहे न केवल आध्यात्मिक उपदेश देते हैं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों और पाखंडों पर तीखा प्रहार भी करते हैं। तिब्बती परंपरा के अनुसार उन्होंने कुल 32 ग्रंथों की रचना की थी।
- सामाजिक चेतना और विद्रोह: उन्होंने जाति-पाँति, छुआछूत और ऊंच-नीच की वर्ण व्यवस्था का कड़ा विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि केवल वेदों को पढ़ने से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि मन की शुद्धि अनिवार्य है।
- भविष्य के साहित्य पर प्रभाव: सरहपा की विद्रोही विचारधारा और उनकी रहस्यात्मक 'संधा भाषा' का सीधा प्रभाव भक्तिकाल के कबीर और अन्य निर्गुण संतों पर पड़ा। कबीर की 'उलटबाँसियों' और विद्रोही तेवर के बीज सरहपा के साहित्य में ही खोजे जा सकते हैं।
50 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न संख्या 1. सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि मानने वाले विद्वान कौन हैं?
उत्तर: सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि मानने वाले विद्वान राहुल सांकृत्यायन हैं।
प्रश्न संख्या 2. सरहपा का सर्वमान्य समय क्या माना जाता है?
उत्तर: सरहपा का सर्वमान्य समय 769 ईस्वी (8वीं शताब्दी) माना जाता है।
प्रश्न संख्या 3. सरहपा किस संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं?
उत्तर: सरहपा सिद्धों के 'सहजयान' संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं।
प्रश्न संख्या 4. सरहपा की सबसे प्रसिद्ध रचना का नाम क्या है?
उत्तर: सरहपा की सबसे प्रसिद्ध रचना का नाम 'दोहाकोश' है।
प्रश्न संख्या 5. सरहपा को किन अन्य नामों से जाना जाता है?
उत्तर: सरहपा को सरोजवज्र और राहुलभद्र के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न संख्या 6. चौरासी सिद्धों में सबसे पुराना सिद्ध किसे माना जाता है?
उत्तर: चौरासी सिद्धों में सबसे पुराना सिद्ध सरहपा को माना जाता है।
प्रश्न संख्या 7. सरहपा ने मोक्ष प्राप्ति के लिए किस मार्ग पर बल दिया?
उत्तर: सरहपा ने मोक्ष प्राप्ति के लिए 'सहज मार्ग' पर बल दिया।
प्रश्न संख्या 8. सरहपा का जन्म किस कुल में हुआ था?
उत्तर: सरहपा का जन्म एक ब्राह्मण कुल में हुआ था।
प्रश्न संख्या 9. 'दोहा-चौपाई' शैली का प्रथम प्रयोग किस कवि ने किया?
उत्तर: 'दोहा-चौपाई' शैली का प्रथम प्रयोग सरहपा ने किया।
प्रश्न संख्या 10. सरहपा किस राजा के समकालीन थे?
उत्तर: सरहपा पाल वंश के राजा धर्मपाल के समकालीन थे।
प्रश्न संख्या 11. सिद्धों की कुल संख्या कितनी मानी गई है?
उत्तर: सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है।
प्रश्न संख्या 12. सरहपा की भाषा को विद्वानों ने क्या नाम दिया है?
उत्तर: सरहपा की भाषा को विद्वानों ने 'संधा भाषा' या 'संध्या भाषा' नाम दिया है।
प्रश्न संख्या 13. "पंडिअ सअल सत्थ बखणइ" प्रसिद्ध पंक्ति किसकी है?
उत्तर: यह प्रसिद्ध पंक्ति सिद्ध कवि सरहपा की है।
प्रश्न संख्या 14. सरहपा ने अपनी रचनाओं में किनका कड़ा विरोध किया?
उत्तर: सरहपा ने बाह्याडंबरों, पाखंडों और वर्ण व्यवस्था का कड़ा विरोध किया।
प्रश्न संख्या 15. तिब्बती परंपरा के अनुसार सरहपा ने कितने ग्रंथों की रचना की?
उत्तर: तिब्बती परंपरा के अनुसार सरहपा ने कुल 32 ग्रंथों की रचना की।
प्रश्न संख्या 16. सरहपा की साधना पद्धति का मुख्य केंद्र क्या था?
उत्तर: सरहपा की साधना पद्धति का मुख्य केंद्र 'अंतःसाधना' और 'चित्त की शुद्धि' था।
प्रश्न संख्या 17. 'दोहाकोश' का संपादन किसने किया था?
उत्तर: 'दोहाकोश' का संपादन प्रबोध चंद्र बागची ने किया था।
प्रश्न संख्या 18. सरहपा के साहित्य में किस रस की प्रधानता है?
उत्तर: सरहपा के साहित्य में शांत रस और वीभत्स रस (नश्वरता के संदर्भ में) की प्रधानता है।
प्रश्न संख्या 19. कबीर के विद्रोही तेवर का मूल स्रोत किस कवि को माना जाता है?
उत्तर: कबीर के विद्रोही तेवर का मूल स्रोत सरहपा को माना जाता है।
प्रश्न संख्या 20. सरहपा ने शास्त्रों के स्थान पर किसे महत्व दिया?
उत्तर: सरहपा ने शास्त्रों के स्थान पर 'स्वानुभूति' को महत्व दिया।
प्रश्न संख्या 21. "जहि मन पवन न संचरइ" यह पंक्ति किस कवि की है?
उत्तर: यह पंक्ति सरहपा की है, जो समाधि की अवस्था का वर्णन करती है।
प्रश्न संख्या 22. सरहपा ने ब्राह्मणों के किस पाखंड पर चोट की?
उत्तर: सरहपा ने ब्राह्मणों के वेदों के निरर्थक पाठ और यज्ञ आदि पाखंडों पर चोट की।
प्रश्न संख्या 23. सरहपा की रचनाओं में प्रयुक्त 'दोहा' मूलतः किस भाषा का छंद है?
उत्तर: 'दोहा' मूलतः अपभ्रंश भाषा का छंद है।
प्रश्न संख्या 24. सरहपा ने सिद्ध होने के लिए किसकी अनिवार्यता बताई?
उत्तर: सरहपा ने सिद्ध होने के लिए 'गुरु' की अनिवार्यता बताई।
प्रश्न संख्या 25. 'राहुलभद्र' नाम सरहपा को कहाँ मिला था?
उत्तर: 'राहुलभद्र' नाम सरहपा को नालंदा में बौद्ध दीक्षा के समय मिला था।
प्रश्न संख्या 26. सरहपा ने निर्वाण के लिए किसे आवश्यक माना?
उत्तर: सरहपा ने निर्वाण के लिए 'महासुख' की अवस्था को आवश्यक माना।
प्रश्न संख्या 27. सरहपा के शिष्यों में सबसे प्रमुख कौन थे?
उत्तर: सरहपा के शिष्यों में सबसे प्रमुख सिद्ध 'शबरपा' थे।
प्रश्न संख्या 28. "पंडितों को केवल शब्द व्याख्याता" किसने कहा?
उत्तर: पंडितों को केवल शब्द व्याख्याता सरहपा ने कहा।
प्रश्न संख्या 29. सरहपा का काव्य किस प्रकार का काव्य है?
उत्तर: सरहपा का काव्य मुक्तक और उपदेशात्मक काव्य है।
प्रश्न संख्या 30. सरहपा ने शरीर को क्या संज्ञा दी?
उत्तर: सरहपा ने शरीर को ही सबसे बड़ा 'तीर्थ' और 'देवालय' माना।
प्रश्न संख्या 31. सरहपा की रचनाओं में किस संप्रदाय के बीज मिलते हैं?
उत्तर: सरहपा की रचनाओं में आगे चलकर विकसित हुए नाथ और संत संप्रदाय के बीज मिलते हैं।
प्रश्न संख्या 32. 'संधा भाषा' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'संधा भाषा' का अर्थ ऐसी भाषा से है जिसमें प्रतीकों के माध्यम से अंतःसाधना की बातें कही गई हों।
प्रश्न संख्या 33. सरहपा ने बाह्य स्नान के बदले किसे श्रेष्ठ माना?
उत्तर: सरहपा ने बाह्य स्नान के बदले 'मन के स्नान' को श्रेष्ठ माना।
प्रश्न संख्या 34. सरहपा के अनुसार सहज आनंद कहाँ प्राप्त होता है?
उत्तर: सरहपा के अनुसार सहज आनंद स्वयं के भीतर ही प्राप्त होता है।
प्रश्न संख्या 35. सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि मानने में विद्वानों की क्या दलील है?
उत्तर: विद्वान मानते हैं कि सरहपा की भाषा में हिंदी के प्रारंभिक रूप और चेतना स्पष्ट दिखाई देती है।
प्रश्न संख्या 36. 'सरह' शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'सरह' का अर्थ बाण होता है, जो उनकी एकाग्र साधना का प्रतीक है।
प्रश्न संख्या 37. सरहपा ने समाज के किस वर्ग को अपनी साधना में स्थान दिया?
उत्तर: सरहपा ने समाज के उपेक्षित और निम्न वर्ग को अपनी साधना में स्थान दिया।
प्रश्न संख्या 38. सरहपा के काव्य में कौन सी शैली प्रधान है?
उत्तर: सरहपा के काव्य में 'खंडन-मंडन' की शैली प्रधान है।
प्रश्न संख्या 39. सरहपा की रचनाएँ किस धर्म से संबंधित हैं?
उत्तर: सरहपा की रचनाएँ बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा से संबंधित हैं।
प्रश्न संख्या 40. सरहपा ने किसे अज्ञान का प्रतीक माना?
उत्तर: सरहपा ने शास्त्रों के रटने और बाह्य कर्मकांडों को अज्ञान का प्रतीक माना।
प्रश्न संख्या 41. 'बौद्ध गान ओ दोहा' में किसकी रचनाएँ संकलित हैं?
उत्तर: 'बौद्ध गान ओ दोहा' में सरहपा और अन्य सिद्धों की रचनाएँ संकलित हैं।
प्रश्न संख्या 42. सरहपा का जन्म स्थान कहाँ माना जाता है?
उत्तर: सरहपा का जन्म स्थान बिहार का नालंदा क्षेत्र माना जाता है।
प्रश्न संख्या 43. सरहपा ने गुरु को क्या उपाधि दी?
उत्तर: सरहपा ने गुरु को 'परम प्रकाश' देने वाला माना।
प्रश्न संख्या 44. सरहपा के साहित्य में 'काया' (शरीर) का क्या महत्व है?
उत्तर: सरहपा के अनुसार काया ही साधना का उपकरण और ब्रह्मांड का रूप है।
प्रश्न संख्या 45. सरहपा ने किसके मोह का त्याग करने को कहा?
उत्तर: सरहपा ने संसार की नश्वर वस्तुओं और अहंकार के मोह का त्याग करने को कहा।
प्रश्न संख्या 46. सरहपा की रचनाओं की मुख्य भाषा क्या है?
उत्तर: सरहपा की रचनाओं की मुख्य भाषा अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी है।
प्रश्न संख्या 47. क्या सरहपा ने संस्कृत में भी रचनाएँ की थीं?
उत्तर: हाँ, सरहपा ने अपभ्रंश के साथ-साथ संस्कृत में भी कुछ दार्शनिक ग्रंथों की रचना की थी।
प्रश्न संख्या 48. सरहपा का हिंदी साहित्य के आदिकाल में क्या महत्व है?
उत्तर: सरहपा हिंदी साहित्य की वैचारिक और भाषिक परंपरा के प्रारंभिक बिंदु हैं।
प्रश्न संख्या 49. "स्वानुभूति ही सत्य है" यह किसका मूल मंत्र था?
उत्तर: "स्वानुभूति ही सत्य है" यह सिद्ध कवि सरहपा का मूल मंत्र था।
प्रश्न संख्या 50. सरहपा के दोहों का संकलन सबसे पहले किसने प्रकाशित किया?
उत्तर: सरहपा के दोहों का संकलन सबसे पहले हरप्रसाद शास्त्री ने 'बौद्ध गान ओ दोहा' में प्रकाशित किया।
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