प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना पर प्रकाश डालिए। प्रस्तावना (Introduction) हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर 'कथा सम्राट' (Emperor of Stories) और 'उपन्यास सम्राट' के रूप में देदीप्यमान मुंशी प्रेमचंद केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम (Indian Freedom Struggle) के एक मूक सिपाही और युगद्रष्टा थे। साहित्य को "जीवन की आलोचना" (Criticism of Life) मानने वाले प्रेमचंद ने अपनी कलम को ही अपना हथियार बनाया। जब हम उनकी कहानियों का समग्र मूल्यांकन करते हैं, तो उनमें राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) का स्वर सबसे अधिक मुखर, व्यापक और प्रखर दिखाई देता है। प्रेमचंद का युग (1880-1936) भारतीय इतिहास में एक भयंकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल का काल था। यह वह समय था जब भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद (British Imperialism) की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। ऐसे में प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे जनता में देशभक्ति (Patriotism) और सांस्कृतिक जागरण (Cultural Awakening) का शंखनाद बन गईं। इस विस्तृत आलेख म...
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