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बी. एस. ब्लूम के ज्ञानात्मक और भावात्मक पक्ष के उद्देश्य Bloom Ke Gyanatmak Bhavatmak Paksh


बी. एस. ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण ज्ञानात्मक और भावात्मक पक्ष 

(Bloom's Taxonomy)


बी. एस. ब्लूम के ज्ञानात्मक और भावात्मक पक्ष के उद्देश्य
Bloom's Taxonomy 

​शिक्षा एक अत्यंत ही सोद्देश्य और सुविचारित प्रक्रिया है। कक्षा के भीतर एक शिक्षक जो कुछ भी पढ़ाता या सिखाता है, उसका अंतिम और सर्वोपरि लक्ष्य विद्यार्थी के व्यवहार में एक सकारात्मक, स्थायी और अपेक्षित परिवर्तन लाना होता है। परंतु, एक शिक्षक या शिक्षाविद् यह कैसे निर्धारित करेगा कि छात्र ने वास्तव में क्या सीखा है और किस स्तर तक सीखा है? 


इसी जटिल शैक्षिक समस्या का अत्यंत वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करने के लिए डॉ. बेंजामिन एस. ब्लूम (Dr. Benjamin S. Bloom) और उनके साथी शोधकर्ताओं ने शैक्षिक उद्देश्यों का एक अत्यंत व्यवस्थित और पदानुक्रमित वर्गीकरण प्रस्तुत किया। शिक्षा के क्षेत्र में इसे 'ब्लूम की टैक्सोनॉमी' (Bloom's Taxonomy) के नाम से जाना जाता है।

​यदि आप शिक्षा शास्त्र, मनोविज्ञान का गहन अध्ययन कर रहे हैं, या शिक्षक भर्ती से संबंधित उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो ब्लूम के इस वर्गीकरण की सैद्धांतिक और व्यावहारिक समझ होना आपके लिए नितांत आवश्यक है।

​इस विस्तृत और विश्लेषणात्मक लेख में हम ब्लूम के वर्गीकरण के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों—ज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain) और भावात्मक पक्ष (Affective Domain)—का अत्यंत सूक्ष्मता और गहराई के साथ अध्ययन करेंगे।

ब्लूम के वर्गीकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आवश्यकता (Background of Bloom's Taxonomy)

​शिकागो विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्रोफेसर बी. एस. ब्लूम ने वर्ष 1956 में अपनी युगांतकारी पुस्तक 'Taxonomy of Educational Objectives' का प्रकाशन किया। ब्लूम और उनके सहयोगियों का स्पष्ट मानना था कि संपूर्ण अधिगम (Holistic Learning) केवल मस्तिष्क में सूचनाओं को जमा करने तक सीमित नहीं है। अधिगम वास्तव में मानव व्यक्तित्व के तीन मुख्य आयामों से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए, उन्होंने शैक्षिक उद्देश्यों को तीन मुख्य पक्षों (Domains) में विभाजित किया:

  • ज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain): यह हमारे मस्तिष्क (Head) या बौद्धिक क्षमता से संबंधित है। इसका मुख्य कार्य 'विचारना' या तर्क करना है।
  • भावात्मक पक्ष (Affective Domain): यह हमारे हृदय (Heart), भावनाओं, दृष्टिकोण और मूल्यों से संबंधित है। इसका मुख्य कार्य 'महसूस करना' है।
  • मनोवैज्ञानिक/क्रियात्मक पक्ष (Psychomotor Domain): यह हमारे शारीरिक कौशल, गामक क्रियाओं और हाथों (Hand) की गतिविधियों से संबंधित है। इसका मुख्य कार्य शारीरिक रूप से 'करना' है।

​1. ज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain) का विश्लेषण

​ज्ञानात्मक पक्ष का वर्गीकरण मुख्य रूप से बी. एस. ब्लूम द्वारा 1956 में प्रस्तुत किया गया था। शिक्षा प्रणाली में सबसे अधिक ध्यान इसी पक्ष पर दिया जाता है। यह पक्ष पूरी तरह से छात्र के बौद्धिक विकास, ज्ञान अर्जन, सोच, तर्क क्षमता, समस्या समाधान और मानसिक शक्तियों के विकास से जुड़ा हुआ है।

​ब्लूम ने ज्ञानात्मक उद्देश्यों को सरलता से जटिलता (Simple to Complex) के क्रम में छह स्तरों में विभाजित किया है। यह एक पदानुक्रम (Hierarchy) है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि जब तक कोई छात्र निचले स्तर के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह उच्च स्तर के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता।

ज्ञानात्मक पक्ष के 6 स्तर (निचले से उच्च स्तर की ओर):

I. ज्ञान (Knowledge)

यह ज्ञानात्मक पक्ष का प्रथम, सबसे निचला और आधारभूत स्तर है। इसका संबंध तथ्यों, विशिष्ट सूचनाओं, सिद्धांतों, नियमों और परिभाषाओं को केवल याद रखने (Recall) और पहचानने (Recognize) से है। इस स्तर पर छात्र अपनी स्मृति या रटने की क्षमता का सर्वाधिक उपयोग करता है। छात्र जानकारी को बिना समझे भी याद कर सकता है।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ (Action Verbs): परिभाषित करना, सूची बनाना, नाम बताना, पहचानना, स्मरण करना।
  • उदाहरण: यदि किसी छात्र से पूछा जाए कि "भारत की राजधानी क्या है?" या "न्यूटन के गति का पहला नियम क्या है?" और वह उसे ज्यों का त्यों बता दे, तो यह 'ज्ञान' स्तर की प्राप्ति है।

II. बोध या अवबोध (Comprehension)

जब छात्र केवल प्राप्त ज्ञान को रटने के बजाय उसका वास्तविक अर्थ समझने लगता है, तो वह ज्ञान से ऊपर उठकर बोध के स्तर पर पहुँच जाता है। इसमें छात्र दी गई जानकारी का अनुवाद कर सकता है, उसे अपने शब्दों में व्यक्त कर सकता है और दो तथ्यों के बीच संबंध देख सकता है।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ: व्याख्या करना, उदाहरण देना, अनुवाद करना, सारांश निकालना, स्पष्ट करना।
  • उदाहरण: प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की पूरी प्रक्रिया को रटने के बजाय, उसे अपने शब्दों में कक्षा के सामने समझाना। साहित्य में किसी दोहे या कविता का भावार्थ अपने शब्दों में स्पष्ट करना बोध स्तर का सटीक उदाहरण है।

III. अनुप्रयोग (Application)

इस स्तर पर छात्र अपने द्वारा सीखे हुए ज्ञान और समझ का उपयोग नई, अपरिचित और व्यावहारिक परिस्थितियों (New situations) में समस्याओं को हल करने के लिए करता है। यह सिद्धांत को व्यवहार में बदलने का स्तर है।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ: प्रयोग करना, गणना करना, हल करना, प्रदर्शन करना, उपयोग करना।
  • उदाहरण: गणित की कक्षा में सीखे गए किसी सूत्र का प्रयोग करके घर पर या परीक्षा में एक बिल्कुल नया और जटिल सवाल हल करना। व्याकरण में संध‍ि के नियमों को समझकर, निबंध लिखते समय शब्दों में सही संधि का प्रयोग करना।

IV. विश्लेषण (Analysis)

विश्लेषण का अर्थ है किसी जटिल विषय-वस्तु, विचार या जानकारी को छोटे-छोटे हिस्सों (Parts) में विभाजित करना, ताकि उसकी आंतरिक संरचना, अंतर्निहित सिद्धांतों और उनके बीच के संबंधों को गहराई से समझा जा सके।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ: अंतर करना, तुलना करना, विभाजित करना, आलोचना करना, संबंध खोजना।
  • उदाहरण: किसी कविता का विश्लेषण करते समय उसके रस, छंद, अलंकार, भाषा-शैली और भावपक्ष को अलग-अलग करके उसकी साहित्यिक गुणवत्ता को जाँचना। विज्ञान में किसी रासायनिक यौगिक की संरचना का विश्लेषण करके उसके तत्वों को अलग-अलग समझना।

V. संश्लेषण (Synthesis)

संश्लेषण की प्रक्रिया विश्लेषण के ठीक विपरीत होती है। इसमें छात्र विभिन्न स्रोतों से प्राप्त अलग-अलग जानकारियों, विचारों और तत्वों को एक साथ जोड़कर एक नया संपूर्ण रूप (A new whole) तैयार करता है। यह रचनात्मकता (Creativity) और मौलिकता का सर्वोच्च स्तर है।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ: निर्माण करना, रचना करना, योजना बनाना, व्यवस्थित करना, संकलित करना।
  • उदाहरण: विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, किताबों और तथ्यों को मिलाकर इतिहास के किसी कालखंड पर एक नया और मौलिक शोध पत्र (Research Paper) तैयार करना। विज्ञान के कई अलग-अलग सिद्धांतों को मिलाकर एक नया मॉडल या उपयोगी मशीन बनाना।

VI. मूल्यांकन (Evaluation)

यह ज्ञानात्मक पक्ष का सर्वोच्च और अंतिम स्तर है। इसमें छात्र किसी विचार, कार्य, सिद्धांत, नियम या वस्तु के मूल्य (Value) के बारे में अपने तर्क, मापदंडों और आलोचनात्मक सोच के आधार पर सटीक निर्णय (Judgment) लेता है।

  • कार्यसूचक क्रियाएँ: निर्णय लेना, मूल्यांकन करना, समीक्षा करना, निष्कर्ष निकालना, सिद्ध करना।
  • उदाहरण: "ऑनलाइन शिक्षा और पारंपरिक कक्षा शिक्षा में से छात्रों के समग्र विकास के लिए कौन अधिक उपयुक्त है?" इस विषय पर सभी तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद तर्कपूर्ण और निष्पक्ष समीक्षा प्रस्तुत करना मूल्यांकन का स्तर है।

लोरिन एंडरसन और डेविड क्रैथवॉल ने 2001 में इस वर्गीकरण में संशोधन किया था, जिसमें उन्होंने 'मूल्यांकन' को पांचवें स्थान पर और 'संश्लेषण' (रचना करना) को सर्वोच्च स्थान पर रखा था।

​2. भावात्मक पक्ष (Affective Domain) का विश्लेषण

​शिक्षा का उद्देश्य केवल दिमाग को किताबी सूचनाओं से भर देना नहीं है। यदि एक छात्र बहुत मेधावी है, लेकिन उसके अंदर समाज के प्रति संवेदनशीलता, मानवीय मूल्य या सही दृष्टिकोण नहीं है, तो उसकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी। यहीं पर भावात्मक पक्ष की प्रासंगिकता सिद्ध होती है।

​भावात्मक पक्ष का वर्गीकरण डेविड क्रैथवॉल (David Krathwohl), बी. एस. ब्लूम और मासिआ (Masia) द्वारा 1964 में प्रस्तुत किया गया था। यह पक्ष पूर्णतः छात्रों की रुचियों (Interests), दृष्टिकोणों (Attitudes), भावनाओं (Emotions), नैतिक मूल्यों (Values) और उनकी संवेदनाओं के विकास से संबंधित है।

​इसे भी सरलता से जटिलता के क्रम में पांच स्तरों में बाँटा गया है:

I. आग्रहण या ध्यान देना (Receiving / Attending)

यह भावात्मक विकास का सबसे पहला और प्रारंभिक कदम है। इसका अर्थ है छात्र का किसी बाहरी उद्दीपक (Stimulus), विचार या गतिविधि के प्रति संवेदनशील होना और उसे ग्रहण करने या ध्यानपूर्वक सुनने की इच्छा (Willingness to receive) प्रदर्शित करना। इस स्तर पर छात्र पर कोई दबाव नहीं होता, वह स्वतः ध्यान केंद्रित करता है।

  • उदाहरण: जब कक्षा में शिक्षक कोई नैतिक कहानी सुना रहे हों या किसी महत्वपूर्ण सामाजिक विषय पर चर्चा कर रहे हों, तो छात्र का उस जानकारी को बिना किसी शोरगुल के, पूर्ण ध्यान और उत्सुकता से सुनना आग्रहण कहलाता है।

II. अनुक्रिया (Responding)

इस स्तर पर छात्र केवल एक मूक श्रोता बनकर चुपचाप सुनता नहीं रहता, बल्कि वह सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया (Active participation) देना शुरू कर देता है। वह शैक्षिक प्रक्रिया में शामिल होता है और उस कार्य को करने से उसे आंतरिक संतुष्टि और आनंद प्राप्त होता है।

  • उदाहरण: कक्षा में चल रही चर्चा में स्वेच्छा से भाग लेना, शिक्षक से विषय से संबंधित प्रश्न पूछना, या शिक्षक द्वारा दिए गए किसी प्रोजेक्ट कार्य को खुशी-खुशी पूरा करना अनुक्रिया के अंतर्गत आता है।

III. अनुमूल्यन (Valuing)

अनुमूल्यन के स्तर पर छात्र किसी विशेष वस्तु, घटना, विचार या व्यवहार के साथ एक निश्चित 'मूल्य' (Worth) या महत्व को गहराई से जोड़ देता है। छात्र के अंदर किसी विशिष्ट विषय या विचारधारा के प्रति गहरी आस्था, सम्मान और लगाव पैदा होने लगता है।

  • उदाहरण: एक छात्र यह गहराई से महसूस करता है कि पर्यावरण की रक्षा करना केवल परीक्षा का विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन के लिए आवश्यक है। इसलिए वह स्वेच्छा से पेड़ लगाता है और दूसरों को भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करता है। यह उसके भीतर विकसित हुआ एक मूल्य है।

IV. विचारणा या संगठन (Organization)

जैसे-जैसे छात्र बड़ा होता है, उसके पास कई अलग-अलग मूल्य (Values) इकट्ठे हो जाते हैं। कई बार इन मूल्यों में आपस में टकराव होना स्वाभाविक है। इस स्तर पर छात्र अपने विभिन्न मूल्यों की तुलना करता है, उनके बीच के अंतर्विरोधों को सुलझाता है, उनमें सामंजस्य स्थापित करता है और अपने लिए एक सुव्यवस्थित मूल्य प्रणाली (Value System) का निर्माण करता है।

  • उदाहरण: एक छात्र के जीवन में 'मित्रों के साथ घूमना' और 'अपने करियर के लिए कठोर अध्ययन करना' दोनों के अपने-अपने मूल्य हैं। वह भविष्य के महत्व को समझते हुए अपने समय का संगठन इस प्रकार करता है कि अध्ययन को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले, यह विचारणा या संगठन का स्तर है।

V. चरित्रीकरण / मूल्य समूह द्वारा विशेषीकरण (Characterization by a Value Set)

यह भावात्मक पक्ष का अंतिम और सर्वोच्च स्तर है। इस स्तर पर आकर कोई मूल्य या विचारधारा छात्र के व्यवहार का इतना अभिन्न हिस्सा बन जाती है कि वह उसके संपूर्ण चरित्र (Character) और जीवन दर्शन को परिभाषित करने लगती है। व्यक्ति की समाज में पहचान ही उसके उन स्थायी मूल्यों से होने लगती है।

  • उदाहरण: यदि किसी छात्र ने 'ईमानदारी' और 'सत्यनिष्ठा' को अपने चरित्र में पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया है, तो जीवन की सबसे कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी वह बेईमानी का मार्ग नहीं चुनेगा। उसका यह व्यवहार अस्थायी नहीं होगा, बल्कि स्थायी होगा। यही भावात्मक विकास का चरित्रीकरण है।

ज्ञानात्मक और भावात्मक पक्ष के मध्य तुलनात्मक संबंध और अंतर

​यद्यपि अध्ययन की सुविधा के लिए हमने ज्ञानात्मक और भावात्मक पक्ष को अलग-अलग पढ़ा है, लेकिन वास्तविकता में ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और गहराई से जुड़े हुए हैं। इनके बीच के मुख्य अंतर और संबंधों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • मूल केंद्र और फोकस: ज्ञानात्मक पक्ष का पूरा ध्यान बौद्धिक क्षमता, स्मृति, ज्ञान अर्जन और तर्क शक्ति पर केंद्रित होता है। इसके विपरीत, भावात्मक पक्ष का पूरा फोकस व्यक्ति की भावनाओं, दृष्टिकोणों, रुचियों और चारित्रिक मूल्यों के विकास पर होता है।
  • शारीरिक जुड़ाव: मनोवैज्ञानिक रूप से ज्ञानात्मक पक्ष का सीधा संबंध मनुष्य के मस्तिष्क (Head) से माना जाता है, जबकि भावात्मक पक्ष का संबंध मनुष्य के हृदय (Heart) और उसकी अंतरात्मा से माना जाता है।
  • प्रतिपादक और विकास: ज्ञानात्मक पक्ष का विस्तृत वर्गीकरण डॉ. बी. एस. ब्लूम द्वारा 1956 में किया गया था। वहीं, भावात्मक पक्ष को 1964 में डेविड क्रैथवॉल, ब्लूम और मासिआ ने मिलकर विकसित किया था।
  • सर्वोच्च स्तर की भिन्नता: ज्ञानात्मक पक्ष का सर्वोच्च स्तर 'मूल्यांकन' (या नवीन वर्गीकरण के अनुसार 'सृजन करना') है, जो मानसिक क्षमता की पराकाष्ठा है। दूसरी ओर, भावात्मक पक्ष का सर्वोच्च स्तर 'चरित्रीकरण' है, जो व्यक्ति के नैतिक और चारित्रिक विकास की पराकाष्ठा है।
  • मापन और मूल्यांकन में अंतर: ज्ञानात्मक पक्ष का मूल्यांकन करना अत्यंत सरल है। लिखित और मौखिक परीक्षाओं के माध्यम से शिक्षक आसानी से जाँच सकते हैं कि छात्र की बौद्धिक क्षमता कितनी है। लेकिन, भावात्मक पक्ष का मूल्यांकन करना बहुत जटिल है क्योंकि यह आंतरिक होता है। किसी छात्र के हृदय में ईमानदारी या देशभक्ति का स्तर कितना है, इसे किसी साधारण पेन-पेपर टेस्ट से नहीं नापा जा सकता; इसके लिए निरंतर अवलोकन की आवश्यकता होती है।

​शिक्षा प्रणाली और प्रतियोगी परीक्षाओं में ब्लूम के वर्गीकरण का महत्व

​शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया (Teaching-Learning Process) में ब्लूम की टैक्सोनॉमी का महत्व अतुलनीय है। जो छात्र भविष्य में शिक्षक, प्राध्यापक या शिक्षा अधिकारी बनने का सपना देख रहे हैं, उनके लिए इसके व्यावहारिक उपयोग को समझना अत्यंत आवश्यक है:

  • स्पष्ट शिक्षण उद्देश्यों का निर्माण: जब एक जागरूक शिक्षक कक्षा में पढ़ाने जाने से पहले अपनी पाठ योजना (Lesson Plan) तैयार करता है, तो वह ब्लूम के ज्ञानात्मक और भावात्मक स्तरों के आधार पर ही अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। इससे उसे स्पष्ट होता है कि वह कक्षा में क्या हासिल करना चाहता है।
  • आदर्श प्रश्न पत्र का निर्माण (Test Construction): ब्लूम की टैक्सोनॉमी एक संतुलित प्रश्न पत्र बनाने में मदद करती है। एक आदर्श परीक्षा में केवल रटने वाले (ज्ञान स्तर) प्रश्न नहीं होने चाहिए। उसमें समझ जाँचने के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न, और विश्लेषण तथा मूल्यांकन क्षमता जाँचने के लिए दीर्घ उत्तरीय या विश्लेषणात्मक प्रश्न भी शामिल होने चाहिए।
  • उचित शिक्षण विधियों का चयन: यदि शिक्षक का उद्देश्य केवल 'ज्ञान' स्तर का विकास करना है, तो व्याख्यान विधि (Lecture method) पर्याप्त हो सकती है। लेकिन यदि उद्देश्य छात्रों में 'विश्लेषण' या 'संश्लेषण' का विकास करना है, तो शिक्षक को प्रोजेक्ट विधि (Project method), अन्वेषण विधि (Heuristic method) या समस्या समाधान विधि का उपयोग करना होगा।
  • संपूर्ण व्यक्तित्व का संतुलित विकास: ब्लूम का यह वर्गीकरण शिक्षकों को याद दिलाता है कि ज्ञानात्मक पक्ष जहाँ छात्र को विषय का विद्वान और विशेषज्ञ बनाता है, वहीं भावात्मक पक्ष उसे एक अच्छा, नैतिक, दयालु और जिम्मेदार नागरिक बनाता है। राष्ट्र के निर्माण के लिए इन दोनों का संतुलन अत्यंत आवश्यक है।

​निष्कर्ष (Conclusion)

​डॉ. बी. एस. ब्लूम और उनके सहयोगियों द्वारा प्रस्तुत शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण आधुनिक शिक्षा मनोविज्ञान और शिक्षण प्रणाली का एक प्रमुख और अटल स्तंभ है। यह वर्गीकरण हमें यह स्पष्ट रूप से सिखाता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल सूचनाओं को रटकर परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त करना (ज्ञानात्मक का निचला स्तर) नहीं होना चाहिए।

​सच्ची शिक्षा वह है जहाँ छात्र प्राप्त ज्ञान का विश्लेषण कर सके, नई परिस्थितियों में उसका उपयोग कर सके, नए और मौलिक विचारों का सृजन कर सके, और सबसे महत्वपूर्ण बात—उन सकारात्मक मूल्यों और संवेदनाओं को अपने चरित्र का स्थायी हिस्सा बना सके (भावात्मक का सर्वोच्च स्तर)। जब ज्ञानात्मक और भावात्मक दोनों पक्षों का समानांतर रूप से विकास होता है, तभी शिक्षा अपने वास्तविक और सर्वोत्कृष्ट अर्थ को प्राप्त करती है।


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