प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना पर प्रकाश डालिए।
प्रस्तावना (Introduction)
हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर 'कथा सम्राट' (Emperor of Stories) और 'उपन्यास सम्राट' के रूप में देदीप्यमान मुंशी प्रेमचंद केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम (Indian Freedom Struggle) के एक मूक सिपाही और युगद्रष्टा थे। साहित्य को "जीवन की आलोचना" (Criticism of Life) मानने वाले प्रेमचंद ने अपनी कलम को ही अपना हथियार बनाया। जब हम उनकी कहानियों का समग्र मूल्यांकन करते हैं, तो उनमें राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) का स्वर सबसे अधिक मुखर, व्यापक और प्रखर दिखाई देता है।
प्रेमचंद का युग (1880-1936) भारतीय इतिहास में एक भयंकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल का काल था। यह वह समय था जब भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद (British Imperialism) की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। ऐसे में प्रेमचंद की कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे जनता में देशभक्ति (Patriotism) और सांस्कृतिक जागरण (Cultural Awakening) का शंखनाद बन गईं। इस विस्तृत आलेख में हम मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना के विभिन्न आयामों, स्वरूपों और उनके वैचारिक विकास का गहराई से विश्लेषण करेंगे, ताकि इस विषय से जुड़ा कोई भी संशय शेष न रहे।
राष्ट्रीय चेतना का अर्थ और प्रेमचंद का दृष्टिकोण
(Meaning of National Consciousness and Premchand's Perspective)
राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) से तात्पर्य केवल एक भौगोलिक भूखंड के प्रति प्रेम से नहीं है, बल्कि यह उस देश के निवासियों, उनकी संस्कृति, उनके दुख-दर्द और उनकी सामूहिक उन्नति के प्रति एक गहरी प्रतिबद्धता (Commitment) है।
प्रेमचंद के लिए 'राष्ट्र' का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति (Political Freedom) पा लेना नहीं था। उनका राष्ट्रवाद अत्यंत समावेशी (Inclusive Nationalism) था। उनके अनुसार, सच्ची आज़ादी तब तक नहीं आ सकती जब तक देश सामाजिक-आर्थिक मुक्ति (Socio-economic Emancipation) प्राप्त न कर ले। यदि अंग्रेज़ चले भी जाएं और सत्ता देसी ज़मींदारों, पूंजीपतियों और सामंतों (Feudals) के हाथ में आ जाए, जो गरीब किसान का शोषण करते हों, तो ऐसी आज़ादी प्रेमचंद की दृष्टि में व्यर्थ थी। अतः उनकी कहानियों में राष्ट्रीय चेतना केवल अंग्रेज़ों के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन सभी आंतरिक कुरीतियों, शोषण और अंधविश्वासों के खिलाफ भी है जो राष्ट्र को भीतर से खोखला कर रहे थे।
'सोज़े वतन' और राष्ट्रवाद की पहली चिंगारी
('Soz-e-Watan' and the First Spark of Nationalism)
प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना का सबसे पहला और उग्र रूप उनके प्रथम कहानी संग्रह "सोज़े वतन" (Soz-e-Watan - राष्ट्र का विलाप / Dirge of the Nation) में दिखाई देता है। 1908 में जब यह संग्रह प्रकाशित हुआ, तो ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गई। इस संग्रह में कुल पाँच कहानियाँ थीं, जिनमें देशभक्ति का ऐसा ज्वार था कि अंग्रेज़ कलेक्टर ने इसे राजद्रोह (Sedition) माना और इसकी सभी प्रतियां ज़ब्त करके सरेआम जला दीं।
इस संग्रह की सबसे प्रसिद्ध कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" (The Most Precious Jewel in the World) राष्ट्रीय चेतना का एक अद्भुत उदाहरण है। कहानी का नायक 'दिलफ़िगार' अपनी प्रेमिका 'दिलफ़रेब' के लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ खोजने निकलता है। वह आंसुओं, सती की राख आदि कई चीज़ें लाता है, लेकिन अंततः वह एक राजपूत सिपाही के शरीर से गिरा खून का वह आखिरी कतरा लेकर आता है जो उसने अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए बहाया था। इस पर दिलफ़रेब कहती है:
"खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाज़त में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ है।"
यह कहानी मात्र एक प्रेम कथा नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं में मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर (Ultimate Sacrifice) कर देने की भावना का बीजारोपण थी। यहीं से धनपतराय (प्रेमचंद का मूल नाम) का 'प्रेमचंद' के रूप में पुनर्जन्म हुआ, ताकि वे ब्रिटिश सेंसरशिप (Censorship) से बचकर राष्ट्र-निर्माण का लेखन जारी रख सकें।
गांधीवादी प्रभाव और स्वाधीनता आंदोलन का चित्रण
(Gandhian Influence and Depiction of the Freedom Movement)
1920-21 के आस-पास महात्मा गांधी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) शुरू हुआ। प्रेमचंद गांधी जी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी (स्कूल इंस्पेक्टर) से इस्तीफा दे दिया। उनके भीतर का आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद (Idealistic Realism) इसी दौर की उपज है।
प्रेमचंद की कहानियों में गांधी जी का सत्याग्रह (Satyagraha), अहिंसा (Non-violence) और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार (Boycott of Foreign Goods) स्पष्ट रूप से झलकता है।
1. 'समर यात्रा' (Samar Yatra): यह कहानी सीधे तौर पर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी है। कहानी में दिखाया गया है कि कैसे एक सामान्य ग्रामीण वृद्ध, जो अब तक केवल अपने खेत-खलिहान तक सीमित था, 'स्वराज' (Self-rule) के नारे से प्रभावित होकर आंदोलन में कूद पड़ता है। प्रेमचंद यहाँ यह स्थापित करते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल शहरों के पढ़े-लिखे बाबू वर्ग का आंदोलन नहीं है, बल्कि जब तक गाँव का किसान इसमें शामिल नहीं होगा, तब तक राष्ट्र आज़ाद नहीं हो सकता।
2. 'जेल' (Jail) और 'आहुति' (Aahuti): इन कहानियों में प्रेमचंद ने दिखाया है कि कैसे सामान्य नागरिक, विशेषकर महिलाएँ, देश के लिए जेल जाने को अपना सौभाग्य मानने लगी थीं। जेल जाना अब कोई कलंक नहीं, बल्कि देशभक्ति का सर्वोच्च मेडल बन गया था।
3. 'सुजान भगत' (Sujan Bhagat) और स्वदेशी का विचार: यद्यपि यह कहानी एक किसान के आत्मसम्मान की है, लेकिन इसमें और प्रेमचंद की अन्य समकालीन रचनाओं में चरखा (Spinning Wheel) और खादी (Khadi) को केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक राष्ट्रवाद (Economic Nationalism) के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
किसान और मज़दूर: सच्चे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व
(Peasants and Laborers: Representation of the True Nation)
प्रेमचंद का मानना था कि वास्तविक भारत गाँवों में बसता है (Rural India)। उनकी राष्ट्रीय चेतना का सबसे बड़ा केंद्र गाँव का शोषित और पीड़ित किसान है। वे जानते थे कि औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (Colonial Economy) और देसी सामंतवाद (Feudalism) ने मिलकर भारतीय किसान की कमर तोड़ दी है।
'सवा सेर गेहूं' (Sava Seer Gehun): इस कहानी का नायक शंकर एक गरीब किसान है जो एक विप्र (ब्राह्मण) से सवा सेर गेहूं उधार लेता है। वह जीवन भर मेहनत करता है, लेकिन वह ऋण कभी नहीं चुकता और अंततः वह और उसकी आने वाली पीढ़ी 'बंधुआ मज़दूर' (Bonded Laborer) बन जाती है। प्रेमचंद यहाँ यह प्रश्न उठाते हैं कि जिस राष्ट्र में अन्नदाता ही दाने-दाने को मोहताज है और महाजनी व्यवस्था (Moneylending System) उसका खून चूस रही है, वहाँ राष्ट्रवाद का क्या अर्थ है? उनका राष्ट्रवाद महाजनी सभ्यता के पूर्ण विनाश की मांग करता है।
'पूस की रात' (Poos ki Raat): इस कहानी का नायक हल्कू कड़ाके की ठंड में अपने खेत की रखवाली करता है। जब नीलगाय उसकी फसल चर जाती हैं, तो हल्कू दुखी होने के बजाय एक प्रकार की राहत महसूस करता है और कहता है, "अब मजूरी तो न करनी पड़ेगी।" यह कहानी केवल एक किसान की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ किसान का मूक प्रतिरोध (Passive Resistance) है। हल्कू का यह अलगाव (Alienation) भारतीय कृषि व्यवस्था के पतन और खोखले राष्ट्रवाद पर एक गहरा तमाचा है।
नारी मुक्ति और राष्ट्रीय चेतना
(Women's Emancipation and National Consciousness)
प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना में स्त्री-विमर्श (Feminist Consciousness) का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण स्थान है। वे मानते थे कि जिस देश की आधी आबादी (महिलाएँ) चारदीवारी और अज्ञानता में कैद हो, वह देश कभी आज़ाद नहीं हो सकता।
प्रेमचंद की कहानियों की स्त्रियां केवल घर संभालने वाली अबलाएं नहीं हैं, बल्कि वे स्वाधीनता संग्राम की अग्रिम पंक्ति की सेनानी हैं।
'पत्नी से पति' (Patni se Pati): इस कहानी में गोदावरी नामक एक स्त्री है, जिसका पति अंग्रेज़ी सरकार का वफादार अफसर है। गोदावरी अपने पति की ब्रिटिश परस्ती से घृणा करती है। जब देश में स्वदेशी आंदोलन चलता है, तो वह घर की चारदीवारी और पति के आदेशों को धता बताकर विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और आंदोलन का नेतृत्व करने निकल पड़ती है। यह कहानी पितृसत्ता (Patriarchy) और साम्राज्यवाद (Imperialism) दोनों के खिलाफ एक साथ किया गया विद्रोह है।
इसी प्रकार "लांछन", "माँ", और "जुलूस" जैसी कहानियों में प्रेमचंद ने स्त्रियों को रूढ़ियों से बाहर निकलकर राष्ट्र-निर्माण में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलते हुए दिखाया है। उनकी कहानियों की स्त्रियां प्रेमचंद के इस विश्वास का प्रतीक हैं कि नारी की मुक्ति के बिना राष्ट्र की मुक्ति असंभव है।
साम्प्रदायिक सद्भाव: राष्ट्रीय एकता की अनिवार्य शर्त
(Communal Harmony: An Essential Condition for National Integration)
अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी और खतरनाक नीति थी "फूट डालो और राज करो" (Divide and Rule Policy)। वे जानते थे कि यदि हिंदू और मुसलमान एक हो गए, तो भारत पर राज करना असंभव हो जाएगा। प्रेमचंद ने इस खतरे को बहुत गहराई से समझा था। उनकी राष्ट्रीय चेतना में साम्प्रदायिक सद्भाव (Communal Harmony) एक आधारशिला के समान था।
'पंच परमेश्वर' (Panch Parmeshwar): अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की यह कहानी केवल न्याय की कहानी नहीं है, बल्कि यह हिंदू-मुस्लिम एकता का एक स्वर्णिम दस्तावेज़ है। प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि धर्म चाहे कोई भी हो, न्याय और सत्य की आवाज़ एक ही होती है।
'जिहाद' (Jihad) और 'मुक्तिधन' (Muktidhan): इन कहानियों में प्रेमचंद ने धार्मिक कट्टरता (Religious Bigotry) और अंध-राष्ट्रवाद (Jingoism) पर गहरा प्रहार किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि एक सच्चा राष्ट्र भक्त वह है जो इंसानियत को धर्म से ऊपर रखता है। वे धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानते थे, न कि राष्ट्र को बांटने का हथियार।
सामाजिक कुरीतियों का विरोध: एक मजबूत राष्ट्र का आधार
(Opposition to Social Evils: Foundation of a Strong Nation)
प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक न्याय (Social Justice) है। उनका दृढ़ मत था कि जो समाज जाति प्रथा (Caste System) और अस्पृश्यता (Untouchability) जैसी भयंकर बीमारियों से ग्रसित है, वह कभी एक मज़बूत राष्ट्र नहीं बन सकता।
'ठाकुर का कुआं' (Thakur ka Kuan): यह कहानी दलित विमर्श की एक कालजयी रचना है। गंगी का पति जोखू बीमार है और प्यास से तड़प रहा है। गंगी ठाकुर के कुएं से पानी लाने जाती है, लेकिन उसे पानी नहीं भरने दिया जाता क्योंकि वह अछूत है। यहाँ गंगी के मन में जो विद्रोह के स्वर उठते हैं—"हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊँच हैं?"—यह केवल एक दलित स्त्री का दर्द नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की चेतना का सवाल है। प्रेमचंद का राष्ट्रवाद यह पूछता है कि जिस देश में एक इंसान को दूसरे इंसान के कुएं से पानी पीने का अधिकार नहीं है, वह देश अंग्रेज़ों से बराबरी का अधिकार कैसे मांग सकता है?
'सद्गति' (Sadgati): दुखी चमार की यह कहानी धार्मिक पाखंड और सवर्णों के अत्याचार का नग्न चित्र प्रस्तुत करती है। प्रेमचंद चेतावनी देते हैं कि धर्म के नाम पर किया जाने वाला यह अमानवीय शोषण राष्ट्र की आत्मा को नष्ट कर रहा है। उनकी राष्ट्रीय चेतना में दलितों और अछूतों का उद्धार सबसे ऊपर था।
आलोचनात्मक यथार्थवाद की ओर प्रस्थान: खोखले आदर्शों का अंत
(Shift towards Critical Realism: End of Hollow Ideals)
जैसे-जैसे समय बीतता गया और आज़ादी का संघर्ष लंबा खिंचता गया, प्रेमचंद को यह अहसास होने लगा कि केवल हृदय परिवर्तन से शोषकों का स्वभाव नहीं बदलेगा। जीवन के अंतिम वर्षों (1930-1936) में उनका गांधीवादी आदर्शवाद दरकने लगा और वे आलोचनात्मक यथार्थवाद (Critical Realism) और कुछ हद तक मार्क्सवाद (Marxism) के करीब आ गए।
'कफ़न' (Kafan): 1936 में रचित यह उनकी अंतिम कहानी है। घीसू और माधव की संवेदनहीनता, आलस्य और अपनी बहू के कफ़न के पैसों से शराब पीना—यह केवल दो दलितों की कहानी नहीं है। यह उस औपनिवेशिक और सामंती व्यवस्था का चरम यथार्थ है जिसने मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दिया। प्रेमचंद यहाँ यह भयानक सच उजागर करते हैं कि अत्यधिक दरिद्रता (Extreme Poverty) और निरंतर शोषण राष्ट्र के नागरिकों को इतना जड़ (Dehumanized) बना सकता है कि उनमें संवेदना का एक कतरा भी न बचे। कफ़न की यह चेतना एक ऐसे राष्ट्र का रोना है जो अपनी ही व्यवस्थाओं के बोझ तले दबकर सड़ चुका है।
निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, यह पूरी दृढ़ता के साथ कहा जा सकता है कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में निहित राष्ट्रीय चेतना (National Consciousness) एकांगी या संकीर्ण नहीं है। उनका राष्ट्रवाद पश्चिमी साम्राज्यवादियों के आक्रामक राष्ट्रवाद जैसा नहीं था जो दूसरे देशों को गुलाम बनाता है। प्रेमचंद का राष्ट्रवाद विशुद्ध रूप से मानवतावाद (Humanism) पर आधारित था।
उन्होंने आज़ादी को केवल लाल किले पर झंडा फहराने तक सीमित नहीं माना। उनके सपनों का आज़ाद भारत वह था जहाँ 'सवा सेर गेहूं' के लिए किसी किसान की पीढ़ियां गुलाम न बनें; जहाँ 'हल्कू' को कड़ाके की ठंड में खेत में न ठिठुरना पड़े; जहाँ 'गंगी' को प्यासे पति के लिए साफ पानी मिल सके; और जहाँ 'गोदावरी' जैसी स्त्रियां स्वतंत्र होकर राष्ट्र के निर्माण में भाग ले सकें।
प्रेमचंद की कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा जीवंत महाकाव्य (Living Epic) हैं, जिसमें भारत की आत्मा बसती है। उन्होंने अपनी कलम से न केवल सोए हुए देश को जगाया, बल्कि एक समतामूलक, शोषणविहीन और धर्मनिरपेक्ष (Secular) राष्ट्र की जो रूपरेखा अपनी कहानियों में उकेरी, वह आज भी आधुनिक भारत के लिए एक प्रकाश-स्तंभ (Lighthouse) के समान है। उनकी राष्ट्रीय चेतना देश के उस सबसे अंतिम व्यक्ति की मुक्ति की चेतना है, जिसके बिना 'स्वतंत्रता' शब्द अर्थहीन है।
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