अभिप्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषायें:
मानव व्यवहार अत्यंत जटिल और रहस्यमयी है। हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई कारण या अदृश्य शक्ति अवश्य कार्य कर रही होती है। कोई छात्र रात-दिन जागकर परीक्षा की तैयारी क्यों करता है? कोई वैज्ञानिक वर्षों तक एक ही शोध में अपना जीवन क्यों खपा देता है? कोई खिलाड़ी स्वर्ण पदक जीतने के लिए अपने शरीर को कष्ट क्यों देता है? इन सभी प्रश्नों का एकमात्र और सबसे सटीक उत्तर है— "अभिप्रेरणा" (Motivation)।
मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में 'अभिप्रेरणा' एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय विषय है। इसे सीखने का हृदय (Heart of Learning) और सफलता की कुंजी कहा जाता है। इस लेख में हम अभिप्रेरणा के अर्थ, इसकी उत्पत्ति, विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं और इसके विविध आयामों पर चर्चा करेंगे।
अभिप्रेरणा का शाब्दिक अर्थ और उत्पत्ति
अभिप्रेरणा को अंग्रेजी भाषा में 'Motivation' (मोटिवेशन) कहा जाता है। इस अंग्रेजी शब्द की उत्पत्ति लैटिन (Latin) भाषा के शब्द 'Movere' (मोवेरे) या 'Motum' (मोटम) से हुई है। लैटिन भाषा में इस शब्द का अर्थ होता है— "टू मूव" (To move) अर्थात "गति प्रदान करना", "आगे बढ़ाना" या "कार्य की ओर प्रवृत्त करना"।
इस शाब्दिक अर्थ के आधार पर हम कह सकते हैं कि अभिप्रेरणा वह आंतरिक शक्ति या बल है, जो प्राणी को किसी विशेष कार्य को करने के लिए गति प्रदान करती है या उसे व्यवहार करने के लिए उकसाती है। जब तक व्यक्ति में किसी कार्य के प्रति अभिप्रेरणा नहीं होती, तब तक वह उस कार्य को करने के लिए सक्रिय नहीं हो सकता।
व्यावहारिक अर्थ में, अभिप्रेरणा एक प्रकार का आंतरिक तनाव या मनोवैज्ञानिक दशा है, जो व्यक्ति को तब तक बेचैन रखती है जब तक कि वह अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त न कर ले। यह एक ऐसी आग है जो व्यक्ति के भीतर जलती है और उसे निरंतर कर्म पथ पर अग्रसर रखती है।
अभिप्रेरणा की मनोवैज्ञानिक अवधारणा
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अभिप्रेरणा एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह बाहर से दिखाई नहीं देती, बल्कि इसका अनुमान व्यक्ति के व्यवहार से लगाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई विद्यार्थी कक्षा में अत्यंत ध्यानपूर्वक शिक्षक की बातें सुन रहा है और निरंतर नोट्स बना रहा है, तो हम उसके इस व्यवहार को देखकर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह शिक्षा ग्रहण करने के प्रति अत्यधिक 'अभिप्रेरित' है।
अभिप्रेरणा हमारे अंदर एक ऊर्जा का संचार करती है। यह केवल कार्य को शुरू ही नहीं करवाती, बल्कि जब तक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक उस कार्य को जारी रखने की शक्ति भी प्रदान करती है। इसलिए इसे कार्य को प्रारंभ करने, जारी रखने और उसे सही दिशा में निर्देशित करने की प्रक्रिया माना गया है।
विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई अभिप्रेरणा की परिभाषायें
मनोविज्ञान और शिक्षाशास्त्र के कई महान विचारकों और मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने शोध और अनुभवों के आधार पर अभिप्रेरणा को परिभाषित किया है। इन परिभाषाओं का अध्ययन करने से अभिप्रेरणा का वास्तविक स्वरूप पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है। प्रमुख विद्वानों की परिभाषायें निम्नलिखित हैं:
1. बी. एफ. स्किनर (B. F. Skinner) के अनुसार:
"अभिप्रेरणा सीखने का सर्वोत्कृष्ट राजमार्ग है।"
(Motivation is the superhighway to learning.)
स्किनर की यह परिभाषा शिक्षा जगत में सबसे अधिक लोकप्रिय है। उनका मानना था कि जिस प्रकार एक शानदार और चिकने राजमार्ग (Superhighway) पर वाहन अपनी अधिकतम गति से बिना किसी बाधा के दौड़ता है, उसी प्रकार यदि कोई विद्यार्थी पूर्ण रूप से अभिप्रेरित है, तो वह किसी भी विषय को अत्यंत तीव्र गति से और सुगमता से सीख सकता है।
2. सी. वी. गुड (C. V. Good) के अनुसार:
"किसी कार्य को आरम्भ करने, जारी रखने और नियमित करने की प्रक्रिया ही अभिप्रेरणा है।"
इस परिभाषा में अभिप्रेरणा के तीन प्रमुख चरणों को स्पष्ट किया गया है। पहला- किसी काम की शुरुआत करना। दूसरा- बाधाओं के बावजूद उस काम को बीच में न छोड़ना (जारी रखना)। और तीसरा- उस कार्य को एक निश्चित अनुशासन और नियम के साथ पूर्णता तक ले जाना।
3. वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार:
"अभिप्रेरणा व्यक्ति की वह दशा है, जो उसे किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार स्पष्ट करती है।"
वुडवर्थ ने इसे एक 'दशा' (State) माना है। उनके अनुसार, जब व्यक्ति अभिप्रेरित होता है, तो उसका व्यवहार अस्त-व्यस्त नहीं होता, बल्कि वह एक बहुत ही निश्चित और सधा हुआ व्यवहार करता है, जो सीधे उसके लक्ष्य (उद्देश्य) की ओर जाता है।
4. मैकडॉगल (William McDougall) के अनुसार:
"अभिप्रेरणा वे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दशाएं हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।"
- मैकडॉगल ने इसमें शरीर और मन दोनों को शामिल किया है। भूख, प्यास, नींद जैसी शारीरिक जरूरतें और सम्मान, सफलता जैसी मनोवैज्ञानिक जरूरतें ही मनुष्य को कार्य करने के लिए बाध्य करती हैं।
5. जे. पी. गिलफोर्ड (J. P. Guilford) के अनुसार:
"अभिप्रेरणा कोई विशेष आंतरिक कारक अथवा दशा है, जो किसी क्रिया को आरम्भ करने अथवा बनाए रखने की प्रवृत्ति रखती है।"
गिलफोर्ड ने स्पष्ट किया कि यह कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके; यह पूरी तरह से एक आंतरिक कारक (Internal factor) है जो इंसान के मन और मस्तिष्क के भीतर उत्पन्न होता है।
6. क्रैच और क्रचफील्ड (Krech and Crutchfield) के अनुसार:
"अभिप्रेरणा हमारे 'क्यों' का उत्तर देती है।"
यह बहुत ही संक्षिप्त लेकिन गहरी परिभाषा है। हम भोजन 'क्यों' करते हैं? हम पढ़ाई 'क्यों' करते हैं? हम धन 'क्यों' कमाते हैं? मानव व्यवहार से जुड़े इन सभी 'क्यों' (Why) का उत्तर अभिप्रेरणा ही है।
परिभाषाओं के आधार पर अभिप्रेरणा की विशेषताएँ
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं का यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो अभिप्रेरणा के अर्थ, प्रकृति और विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित तथ्य उभर कर सामने आते हैं:
- आंतरिक शक्ति (Internal Power): अभिप्रेरणा कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप अपनी आँखों से देख सकें या हाथों से छू सकें। यह एक अदृश्य, मनोवैज्ञानिक और आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति के भीतर से जन्म लेती है।
- लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार (Goal-Directed Behavior): अभिप्रेरित व्यक्ति का व्यवहार कभी भी दिशाहीन नहीं होता। वह हमेशा किसी न किसी स्पष्ट लक्ष्य की ओर केंद्रित होता है। अभिप्रेरणा व्यक्ति को तब तक बेचैन रखती है जब तक वह लक्ष्य हासिल नहीं कर लेता।
- निरंतर चलने वाली प्रक्रिया (Continuous Process): मानव जीवन में आवश्यकताएं कभी समाप्त नहीं होतीं। एक आवश्यकता की पूर्ति होते ही दूसरी आवश्यकता जन्म ले लेती है। इसलिए अभिप्रेरणा भी जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने वाली एक निरंतर प्रक्रिया है।
- ऊर्जा का संचार (Transmission of Energy): अभिप्रेरणा प्राणी के शरीर और मन में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है। यह थकान और निराशा को दूर भगाकर कार्यक्षमता (Efficiency) को बढ़ाती है।
- चयनात्मक व्यवहार (Selective Behavior): जब व्यक्ति अभिप्रेरित होता है, तो वह व्यर्थ के कार्यों को छोड़कर केवल उन्हीं कार्यों का चयन करता है जो उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।
- आवश्यकता से उत्पत्ति (Originates from Needs): अभिप्रेरणा का जन्म हमेशा किसी न किसी आवश्यकता (Need) से होता है। यदि मनुष्य को किसी चीज की कोई आवश्यकता ही न हो, तो उसमें अभिप्रेरणा उत्पन्न ही नहीं हो सकती। आवश्यकता ही आविष्कार और अभिप्रेरणा दोनों की जननी है।
अभिप्रेरणा के प्रमुख प्रकार
(Types of Motivation)
मनोवैज्ञानिकों ने अभिप्रेरणा को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में विभाजित किया है। किसी भी कार्य के पीछे इन दोनों में से कोई एक या दोनों प्रकार की अभिप्रेरणा काम कर रही होती है:
1. आंतरिक या सकारात्मक अभिप्रेरणा (Intrinsic or Positive Motivation)
जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को अपनी स्वयं की इच्छा, आनंद, रुचि या संतुष्टि के लिए करता है, तो उसे आंतरिक अभिप्रेरणा कहते हैं। इसमें कार्य करने के लिए बाहर से किसी दबाव या लालच की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति कार्य को ही अपना पुरस्कार मानता है।
उदाहरण: एक कवि जब अपनी खुशी और आत्म-संतुष्टि के लिए कविता लिखता है, या जब कोई बच्चा अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कोई किताब पढ़ता है, तो यह आंतरिक अभिप्रेरणा है। इसे सर्वोत्तम प्रकार की अभिप्रेरणा माना जाता है क्योंकि यह स्थायी होती है।
2. बाह्य या नकारात्मक अभिप्रेरणा (Extrinsic or Negative Motivation)
जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को अपनी स्वयं की इच्छा से न करके किसी बाहरी दबाव, भय, पुरस्कार, दंड, या प्रशंसा के कारण करता है, तो उसे बाह्य अभिप्रेरणा कहा जाता है।
उदाहरण: यदि कोई छात्र परीक्षा में इसलिए पढ़ाई कर रहा है ताकि उसे माता-पिता से साइकिल (पुरस्कार) मिल सके, या वह इसलिए काम कर रहा है ताकि उसे शिक्षक से दंड न मिले, तो यह बाह्य अभिप्रेरणा है। यह अभिप्रेरणा तब तक ही काम करती है जब तक बाहरी कारक (पुरस्कार या दंड) मौजूद रहता है।
(विद्वानों जैसे थॉमसन ने इन्हें 'स्वाभाविक' और 'कृत्रिम' नाम दिया है, जबकि मैस्लो ने इन्हें 'जन्मजात' (जैसे भूख, प्यास) और 'अर्जित' (जैसे सम्मान, पद) में बांटा है।)
अभिप्रेरणा चक्र या प्रक्रिया (The Motivation Cycle)
अभिप्रेरणा कोई एक सीधी रेखा नहीं है, बल्कि यह एक चक्रीय प्रक्रिया (Cyclic Process) है जो निरंतर चलती रहती है। इसके मुख्य रूप से तीन अंग (Components) होते हैं, जो मिलकर अभिप्रेरणा चक्र का निर्माण करते हैं:
पहला चरण: आवश्यकता (Need)
मनुष्य के शरीर या मन में जब किसी चीज की कमी या अति हो जाती है, तो उसे आवश्यकता कहते हैं। आवश्यकता अभिप्रेरणा का पहला कदम है। जैसे शरीर में पानी की कमी होना (प्यास की आवश्यकता)।
दूसरा चरण: अंतर्नोद या चालक (Drive)
आवश्यकता के कारण प्राणी के अंदर जो मानसिक तनाव या बेचैनी उत्पन्न होती है, उसे अंतर्नोद कहते हैं। आवश्यकता प्राणी को कार्य करने के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि आवश्यकता के कारण उत्पन्न हुआ यह 'तनाव' (Drive) उसे क्रियाशील बनाता है। उदाहरण के लिए, शरीर में पानी की आवश्यकता होने पर जो 'प्यास' लगती है और गला सूखता है, वह प्यास ही चालक (Drive) है।
तीसरा चरण: प्रोत्साहन या उद्दीपन (Incentive / Goal)
यह पर्यावरण में मौजूद वह वस्तु है जो प्राणी की आवश्यकता को पूरा करती है और उसके अंतर्नोद (तनाव) को शांत कर देती है। जिस वस्तु से लक्ष्य की प्राप्ति होती है, वही प्रोत्साहन है। उपर्युक्त उदाहरण में 'पानी' (Water) ही वह प्रोत्साहन है, जिसे पीकर व्यक्ति की प्यास शांत हो जाती है।
जैसे ही लक्ष्य (पानी) प्राप्त होता है, व्यक्ति का तनाव कम हो जाता है (Reduction of Arousal)। कुछ समय बाद फिर कोई नई आवश्यकता जन्म लेती है और यह चक्र पुनः प्रारंभ हो जाता है।
शिक्षा और जीवन में अभिप्रेरणा का महत्व
अभिप्रेरणा केवल किताबी ज्ञान नहीं है; यह हमारे दैनिक जीवन और विशेषकर शिक्षा जगत का प्राण है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- सीखने को गति प्रदान करना: जैसा कि स्किनर ने कहा है, यह सीखने का राजमार्ग है। बिना अभिप्रेरणा के दुनिया का कोई भी बेहतरीन शिक्षक किसी छात्र को कुछ नहीं सिखा सकता। जब तक छात्र खुद सीखने के लिए अभिप्रेरित नहीं होगा, ज्ञान का निर्माण असंभव है।
- अनुशासन स्थापित करने में: जो छात्र आंतरिक रूप से अभिप्रेरित होते हैं, वे स्वयं अनुशासित रहते हैं। उन्हें बार-बार नियम याद दिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनका लक्ष्य ही उन्हें गलत रास्तों से भटकाने से रोकता है।
- चरित्र निर्माण में: अच्छी कहानियों, महान पुरुषों की जीवनियों और नैतिक शिक्षा के माध्यम से बालकों में उच्च आदर्शों के प्रति अभिप्रेरणा जगाकर उनका श्रेष्ठ चरित्र निर्माण किया जा सकता है।
- ध्यान केंद्रित करने में (Concentration): आज के भटकाव भरे युग में ध्यान केंद्रित करना सबसे कठिन कार्य है। अभिप्रेरणा मानसिक शक्तियों को एक ही दिशा (लक्ष्य) में बांधकर रखने का अचूक साधन है।
- कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति: जीवन में और लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में अनेक बाधाएं आती हैं। एक सामान्य व्यक्ति बाधाओं को देखकर हार मान लेता है, लेकिन एक अभिप्रेरित व्यक्ति (Motivated Person) चट्टान की तरह डटा रहता है और अपनी असफलताओं से भी सीख कर आगे बढ़ता है।
निष्कर्ष
संपूर्ण चर्चा के उपरांत यह निष्कर्ष निकलता है कि अभिप्रेरणा मानव जीवन की वह संजीवनी बूटी है, जो मृतप्राय और हताश व्यक्ति में भी नई ऊर्जा का संचार कर देती है। इसका अर्थ केवल किसी को प्रेरित करना नहीं है, बल्कि यह वह मनोवैज्ञानिक शक्ति है जो हमारे व्यवहार को जन्म देती है, उसे एक निश्चित दिशा प्रदान करती है, और तब तक हमें रुकने नहीं देती जब तक हम अपने गंतव्य पर पहुँच न जाएं।
चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, खेल का मैदान हो, या कोई कॉर्पोरेट कार्यालय, बिना अभिप्रेरणा के कोई भी व्यक्ति अपनी पूर्ण क्षमता (Maximum Potential) का उपयोग नहीं कर सकता। वुडवर्थ, स्किनर और मैकडॉगल जैसे विद्वानों की परिभाषाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि अभिप्रेरणा हमारे अंदर की वह आग है, जिसे यदि सही दिशा मिल जाए, तो वह अज्ञानता और असफलता के हर अंधेरे को मिटाकर सफलता का प्रकाश फैला सकती है। मानव जीवन की किसी भी महान उपलब्धि की नींव में यदि आप झांक कर देखेंगे, तो आपको वहाँ दृढ़ "अभिप्रेरणा" ही मिलेगी।
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