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विज्ञान का अर्थ व विज्ञान की प्रकृति I Vigyaan ka arth I Vigyaan ki Prakriti

विज्ञान का अर्थ व विज्ञान की प्रकृति I Vigyaan ka arth I Vigyaan ki Prakriti
 विज्ञान का अर्थ व विज्ञान की प्रकृति Vigyaan ka arth I Vigyaan ki Prakriti



विज्ञान का अर्थ

  • व्यापक अर्थ में किसी भी विषय ज्ञान वस्तु ज्ञान या व्यवस्थित ज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। पहले लोग विज्ञान में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और गणित के ज्ञान को सम्मिलित मानते थे और अब सामाजिक अध्ययन, अर्थशास्त्र, समाज विज्ञान आदि को भी विज्ञान की संज्ञा देने लगे हैं।
  • वस्तुतः विज्ञान शब्द वि+ज्ञान से बना है। जिसका अर्थ एक विशेष प्रकार का ज्ञान पुरस्कृत ज्ञान अथवा विशिष्ट ज्ञान है। साइंस शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के स्कायर से हुई है जिसका अर्थ है- जानना , लेकिन साइंस शब्द विज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार विज्ञान शब्द का अर्थ उस ज्ञान से है जो बुद्धि द्वारा ग्रहण किया जाए और शब्दों के माध्यम से दूसरों तक प्रेषित किया जाए अर्थात विज्ञान शब्द का अर्थ सार के रूप में ज्ञान से है।

विज्ञान की विभिन्न परिभाषाएं

भिन्न-भिन्न विद्वानों ने विज्ञान शब्द को परिभाषित करने के लिए भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों का सहारा लिया है। जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएं निम्न प्रकार हैं
1. इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका:- "विज्ञान नैसर्गिक घटनाएं और उनके बीच संबंधों का सुव्यवस्थित ज्ञान है।"

2. सामान्य अर्थ:- "ज्ञान का क्रमबद्ध रूप विज्ञान है। अथवा सामान्य ज्ञान का संगठित रूप विज्ञान है।"

3. आइंस्टीन:-  "हमारी ज्ञान अनुभूतियों की अस्त-व्यस्त विभिन्नता की एक तर्कपूर्ण विचार प्रणाली निर्मित करने के प्रयास को विज्ञान कहते हैं।"

4. डैंपियर:- "विज्ञान प्राकृतिक विषय का व्यवस्थित ज्ञान और धारणाओं के बीच संबंधों का तार्किक अध्ययन है।"

विज्ञान की प्रकृति नेचर ऑफ साइंस

  • मनुष्य सदा से सृष्टि के पीछे छिपे सत्य की खोज में रहा है। उसे प्रकृति की बनावट, उसकी कार्यशैली तथा उसके मूल सिद्धांतों को जानने की तीव्र इच्छा रही है। प्रकृति के कार्य के नियमों को समझे बिना प्रकृति की शक्तियों को अपने सुख के लिए प्रयोग में लाना असंभव था।
  • अतः इसके लिए मनुष्य की आकांक्षाओं तथा प्रकृति की कार्य दशाओं में संबंध आवश्यक था परंतु दूसरी ओर यह खतरा भी था कि प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल कार्य करने में कहीं संपूर्ण जीवन ही नष्ट न हो जाए, परंतु संसार के भौतिक नियमों का भेद उसकी यथार्थता तथा उसकी कार्यप्रणाली सदा शाश्वत चुनौती का विषय रहा है। उच्च वैज्ञानिक जैसे आइंस्टीन भी अपने जीवनपर्यंत कठिन परिश्रम के बाद यही अनुभव करते रहे कि "विस्तृत रेतीले मैदान में से कुछ ही पत्थर के टुकड़े उठा पाया हूं।"
  • प्रत्येक विषय की अपनी अलग अलग ही प्रकृति होती है। किन्ही भी दो विषयों की तुलना हम उनकी प्रकृति के आधार पर ही कर सकते हैं विज्ञान विषय की प्रकृति को हम कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के आधार पर इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं।

प्रथम 

  • विज्ञान का आधार प्रत्यक्ष सत्य होता है। आधुनिक विज्ञान चिंतन की दशा में यह एक बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम था जब यह मान लिया गया कि किसी वस्तु के अस्तित्व का प्रमाण उसकी अनुभव शुद्धता है न केवल निगमनात्मक तर्क। जब बहुत दिनों तक यह तय नहीं हो पाया कि ऊपर से गिरने वाली वस्तुओं का त्वरण कितना होता है तब  गैलीलियों को यह शूज आई कि इस बहस के निर्णय के लिए पीसा में स्थित मीनार से वस्तुओं को गिरा कर देखा जाए।

  • तब गैलीलियों का यह प्रयोग न केवल उनके विषय के क्षेत्र में सहायक सिद्ध हुआ बल्कि अनुसंधान प्रणाली में प्रचंड गति का अग्रदूत सिद्ध हुआ। आज यह प्रणाली न केवल प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अपनाई जाती है बल्कि दूसरे क्षेत्रों में भी अपनाई जा रही है।

द्वितीय

  • विज्ञान प्रत्येक तथ्य का विश्लेषण करके उसके प्रत्येक भाग को बारीकी से समझने का प्रयत्न करता है। सृष्टि में बहुत से तथ्य बहुत जटिल हैं इसलिए यदि उनका विश्लेषण करके उन्हें छोटे-छोटे भागों में बांट दिया जाए और फिर समझा जाए तो समझना आसान हो जाता है।
  • उदाहरण के लिए चुंबकीय आकर्षण किस पर निर्भर है? इसे हम कई भागों में बांट सकते हैं। जैसे; क्या वह आकर्षित करने वाले चुंबक के ध्रुव की शक्ति पर निर्भर है? क्या आकर्षित चुंबक के ध्रुव की शक्ति पर निर्भर है? तथा क्या दोनों की बीच की दूरी पर निर्भर है? इत्यादि।
  • तब हम ऐसी स्थिति में किन्ही 2 प्रश्नों को स्थिर रखकर तीसरे का प्रायोगिक निश्चय करते हैं अर्थात पहले और दूसरे को स्थिर मानकर तीसरे का; दूसरे और तीसरे को स्थिर मानकर पहले का; तथा तीसरे और पहले को स्थिर मानकर दूसरे का। आदि।

तृतीय

  • वैज्ञानिक विचारधारा में परिकल्पना का स्थान महत्वपूर्ण होता है। जब कभी हम दो तथ्यों को सदा एक साथ घटित होते हुए देखते हैं तो हम तुरंत उनके बीच किसी संबंध की कल्पना कर लेते हैं। इस कल्पना के आधार पर नए तथ्यों की खोज की जाती है।
  • मानव मस्तिष्क उस समय तक कोई निश्चित धारणा नहीं बनाता जब तक कि उसे सारे आंकड़े उपलब्ध नहीं हो जाते। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वह तुरंत तथ्यों के संबंध की परिकल्पना करना आरंभ कर देता है। इस परिकल्पना से ही आगे के अवलोकन का मार्ग निर्धारित होता है।

  • परिकल्पना हमें संबंधित तथ्यों का दिगदर्शन कराती है लेकिन परिकल्पनाएं संभवत बदलती रहती हैं। जब तक एक परिकल्पना सही मालूम होती है तब तक वह दिग्दर्शन करती है और यदि वह गलत सिद्ध हो जाए तो दूसरी परिकल्पना हमारा दिग्दर्शन करती है।

चतुर्थ

  • वैज्ञानिक विचार धारा पक्षपात रहित होती है। वैज्ञानिक विचार किसी व्यक्ति विशेष की धारणाओं पर निर्भर नहीं हैं और न ही उनमें किसी व्यक्ति की भावनाओं का कोई स्थान है। वैज्ञानिक केवल सत्य की खोज में रहता है। पक्षपातपूर्ण तर्क तथा भावनात्मक आशक्ति उसे ग्राह्य नहीं होती। सत्य ही उसका एकमात्र उद्देश्य होता है।

पंचम

  • विज्ञान वस्तुनिष्ठ मापकों पर निर्भर रहता है। जिन व्यक्तियों को वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण नहीं मिला होता वह अधिकतर अटकल से तथा व्यक्तिगत अंदाज से मूल्यांकन करते हैं। लेकिन जो वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं उनका मूल्यांकन तथ्यों के परिणाम माप तौल या अन्य किन्हीं परीक्षा पर आधारित होता है।

इसलिए विज्ञान की प्रगति अच्छे मापक पर निर्भर करती है। जितना उन मापक यंत्रों का शोधन होता है और जितनी उनमें सूक्ष्मता आती है उतना ही अधिक वे नई-नई बातों को हमारे ज्ञान में लातें हैं।



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