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मानव व्यवहार के आधार The Bases of Human Behaviour

 मानव व्यवहार के आधार

(The Bases of Human Behaviour)

मानव व्यवहार के आधार (The Bases of Human Behaviour)
मानव व्यवहार के आधार
(The Bases of Human Behaviour)

​1. विकासवादी परिप्रेक्ष्य (Evolutionary Perspective)

​विकासवादी दृष्टिकोण इस बात पर केंद्रित है कि समय के साथ मानव व्यवहार कैसे विकसित और अनुकूलित हुआ है। यह मुख्य रूप से चार्ल्स डार्विन के 'विकासवाद के सिद्धांत' (Theory of Evolution) और 'प्राकृतिक चयन' (Natural Selection) की अवधारणाओं पर आधारित है।

  • प्राकृतिक चयन: प्रकृति उन शारीरिक और व्यावहारिक विशेषताओं को चुनती है जो किसी जीव को उसके विशिष्ट पर्यावरण में जीवित रहने और सफलतापूर्वक प्रजनन करने में मदद करती हैं। जो जीव अनुकूलन नहीं कर पाते, वे समय के साथ लुप्त हो जाते हैं।
  • अनुकूलन (Adaptation): मानव व्यवहार के कई पहलू हमारे पूर्वजों की जीवित रहने की आवश्यकताओं के कारण विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए, खतरे के प्रति हमारी तुरंत प्रतिक्रिया (Fight or Flight response), साथी का चुनाव, समूह में रहने की प्रवृत्ति और माता-पिता द्वारा बच्चों की देखभाल।
  • आधुनिक व्यवहार: विकासवादी मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे वर्तमान मस्तिष्क की संरचना और हमारे सहज व्यवहार हमारी लाखों वर्षों की विकासवादी यात्रा का परिणाम हैं, जो हमें पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाते हैं।

​2. व्यवहार के जैविक आधार: तंत्रिका तंत्र और अंतःस्रावी तंत्र (Biological Basis of Behaviour)

​हमारा सोचना, महसूस करना और कोई भी कार्य करना काफी हद तक हमारे शरीर की जैविक संरचना, विशेषकर तंत्रिका और अंतःस्रावी तंत्र द्वारा नियंत्रित होता है।

  • तंत्रिका तंत्र (Nervous System):
    • केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS): इसमें मस्तिष्क (Brain) और मेरुरज्जु (Spinal Cord) शामिल हैं। मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण केंद्र है जो सभी जटिल संज्ञानात्मक कार्यों (सोचना, याद रखना, निर्णय लेना) और भावनाओं को नियंत्रित करता है। मेरुरज्जु मस्तिष्क से शरीर के अन्य भागों तक संदेश ले जाती है और रिफ्लेक्स एक्शन को नियंत्रित करती है।
    • परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS): यह CNS को शरीर के बाकी हिस्सों (अंगों, मांसपेशियों और ग्रंथियों) से जोड़ता है। इसे दैहिक तंत्रिका तंत्र (ऐच्छिक क्रियाएं जैसे चलना) और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (अनैच्छिक क्रियाएं जैसे हृदय गति, पाचन) में बांटा जाता है।
    • न्यूरॉन्स (Neurons): ये तंत्रिका तंत्र की मूल इकाइयाँ या कोशिकाएं हैं जो विद्युत-रासायनिक संकेतों के माध्यम से पूरे शरीर में सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान करती हैं।
  • अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System):
    • ​यह विभिन्न ग्रंथियों (Glands) का एक जटिल नेटवर्क है जो सीधे रक्तप्रवाह में रासायनिक संदेशवाहकों को स्रावित करता है, जिन्हें हार्मोन (Hormones) कहा जाता है।
    • ​हार्मोन हमारे शारीरिक विकास, चयापचय (Metabolism), मूड, और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं।
    • ​इसकी प्रमुख ग्रंथियों में पीयूष ग्रंथि (मास्टर ग्रंथि जो अन्य ग्रंथियों को नियंत्रित करती है), थायरॉयड (ऊर्जा नियंत्रण), एड्रिनल (तनाव के समय एड्रेनालाईन छोड़ना), और जनन ग्रंथियां (यौन विकास और व्यवहार) शामिल हैं।

​3. आनुवंशिकता: जीन एवं व्यवहार (Heredity: Genes and Behaviour)

​आनुवंशिकता से तात्पर्य माता-पिता से बच्चों में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के हस्तांतरण से है। यह निर्धारित करता है कि हम जन्म से क्या क्षमताएं लेकर आते हैं।

  • जीन और गुणसूत्र (Genes and Chromosomes): मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका के केंद्रक में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) होते हैं, जिनमें से आधे माता से और आधे पिता से प्राप्त होते हैं। इन गुणसूत्रों में DNA होता है, और DNA के छोटे खंडों को जीन कहा जाता है। जीन आनुवंशिकता की मूल इकाई हैं।
  • जीनोटाइप और फेनोटाइप:
    • जीनोटाइप: यह व्यक्ति की आंतरिक आनुवंशिक संरचना है (जो दिखाई नहीं देती)।
    • फेनोटाइप: ये वे लक्षण हैं जो बाहरी रूप से दिखाई देते हैं (जैसे आँखों का रंग, लंबाई, या विशिष्ट व्यवहार संबंधी प्रवृत्तियां)। फेनोटाइप केवल जीन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जीन और पर्यावरण के बीच की अंतःक्रिया का परिणाम है।
  • व्यवहार पर प्रभाव: मनोवैज्ञानिक शोध (जैसे जुड़वां बच्चों के अध्ययन) दर्शाते हैं कि बुद्धि, व्यक्तित्व के विभिन्न लक्षण, और यहाँ तक कि कुछ मानसिक विकारों की प्रवृत्तियां आनुवंशिकता से काफी प्रभावित होती हैं। हालाँकि, जीन केवल एक 'संभावना' प्रदान करते हैं; पर्यावरण यह तय करता है कि वे क्षमताएं कितनी विकसित होंगी।

​4. व्यवहार के सांस्कृतिक आधार (Cultural Basis of Behaviour)

​जहाँ जीव विज्ञान और आनुवंशिकता व्यवहार की नींव रखते हैं, वहीं संस्कृति उस व्यवहार को दिशा और स्वरूप प्रदान करती है।

  • संस्कृति का अर्थ: संस्कृति एक समाज या समूह के लोगों द्वारा साझा किए गए विश्वासों, मूल्यों, रीति-रिवाजों, कला, भाषा, और जीवन जीने के तरीकों का समग्र रूप है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है।
  • संस्कृति के प्रकार:
    • भौतिक संस्कृति: इसमें उपकरण, तकनीक, कपड़े, भोजन और इमारतें जैसी मूर्त वस्तुएं शामिल हैं।
    • अभौतिक संस्कृति: इसमें विचार, नियम, मान्यताएं, मूल्य और सामाजिक दृष्टिकोण शामिल हैं।
  • व्यवहार पर प्रभाव: संस्कृति यह तय करती है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं (प्रत्यक्षण), हमारी भावनाएं कैसे व्यक्त होती हैं, और हम दूसरों के साथ कैसे बातचीत करते हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी संस्कृतियां प्रायः व्यक्तिवाद (Individualism) को बढ़ावा देती हैं जहाँ आत्म-निर्भरता महत्वपूर्ण है, जबकि पूर्वी संस्कृतियां प्रायः सामूहिकता (Collectivism) पर जोर देती हैं जहाँ परिवार और समूह के लक्ष्य व्यक्तिगत लक्ष्यों से ऊपर होते हैं।

​5. समाजीकरण और संस्कृतीकरण (Socialisation and Acculturation)

​ये वे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रक्रियाएं हैं जिनके माध्यम से एक व्यक्ति अपने समाज और संस्कृति के साथ जुड़ता है।

  • समाजीकरण (Socialisation):
    • ​यह एक जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने समाज के मानदंडों (Norms), मूल्यों, और स्वीकृत व्यवहारों को सीखता है और अपनाता है। यह एक जैविक जीव को एक सामाजिक प्राणी में बदल देता है।
    • प्राथमिक समाजीकरण: यह बचपन के शुरुआती वर्षों में मुख्य रूप से परिवार के माध्यम से होता है। बच्चा भाषा और बुनियादी मूल्य यहीं सीखता है।
    • द्वितीयक समाजीकरण: यह घर के बाहर की दुनिया, जैसे स्कूल, सहकर्मी समूह (Peer group), और जनसंचार माध्यमों (Media) के माध्यम से होता है।
  • संस्कृतीकरण (Acculturation):
    • ​जब दो या दो से अधिक भिन्न संस्कृतियों के लोग निरंतर सीधे संपर्क में आते हैं, तो उनके सांस्कृतिक पैटर्न, व्यवहार और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में जो बदलाव आते हैं, उसे संस्कृतीकरण कहते हैं। यह अक्सर प्रवास (Migration) या वैश्वीकरण के कारण होता है।
    • संस्कृतीकरण की रणनीतियां: व्यक्ति नई संस्कृति के संपर्क में आने पर चार तरीके अपना सकता है:
      1. एकीकरण (Integration): अपनी मूल संस्कृति को बनाए रखना और नई संस्कृति को भी अपनाना।
      2. आत्मसातकरण (Assimilation): अपनी मूल संस्कृति की पहचान को छोड़कर पूरी तरह से नई संस्कृति में ढल जाना।
      3. पृथक्करण (Separation): केवल अपनी मूल संस्कृति से जुड़े रहना और नई संस्कृति से बचना।
      4. हाशिए पर जाना (Marginalisation): अपनी मूल संस्कृति और नई संस्कृति दोनों से कट जाना।

​ये पांचों विषय मिलकर इस बात का एक संपूर्ण चित्र प्रस्तुत करते हैं कि मानव व्यवहार किन जैविक और सामाजिक नींवों पर खड़ा है।

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