पर्यावरण का अर्थ । पर्यावरण का क्षेत्र । पर्यावरण के प्रमुख तत्व । Meaning of Environment । Scope । components

पर्यावरण का अर्थ । पर्यावरण का क्षेत्र । पर्यावरण के प्रमुख तत्व । Meaning of Environment । Scope । components

पर्यावरण: अर्थ, क्षेत्र और इसके प्रमुख तत्वों का विस्तृत और गहन अध्ययन
मानव जीवन और प्रकृति के बीच का संबंध उतना ही प्राचीन है जितना कि स्वयं मानव सभ्यता। प्राचीन भारतीय दर्शन में भी यह माना गया है कि हमारा शरीर पांच तत्वों—क्षिति (पृथ्वी), जल, पावक (अग्नि), गगन (आकाश) और समीर (वायु)—से मिलकर बना है, और यही पांच तत्व हमारे आस-पास के जगत का भी निर्माण करते हैं। हमारे चारों ओर का यह विशाल, रहस्यमयी और जीवनदायी ताना-बाना ही 'पर्यावरण' कहलाता है।
पर्यावरण कोई स्थिर या जड़ वस्तु नहीं है; यह एक अत्यंत गतिशील प्रणाली है जिसमें हर पल बदलाव होते रहते हैं। यह लेख पर्यावरण के अर्थ, इसके अत्यंत व्यापक क्षेत्र और उन प्रमुख तत्वों का गहराई से विश्लेषण करता है, जो इस जटिल व्यवस्था को संचालित करते हैं।
पर्यावरण का अर्थ
(Meaning of Environment)
व्याकरण और शब्द-रचना के आधार पर 'पर्यावरण' शब्द हिंदी के दो शब्दों से मिलकर बना है: 'परि' (Pari) और 'आवरण' (Avaran)। 'परि' का अर्थ होता है—हमारे चारों ओर या आस-पास, और 'आवरण' का अर्थ होता है—घेरा या ढका हुआ।
इस प्रकार, शाब्दिक अर्थ में, "वह सब कुछ जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है, हमारा पर्यावरण है।"
अंग्रेजी भाषा में पर्यावरण के लिए 'Environment' शब्द का प्रयोग होता है, जिसकी उत्पत्ति फ्रांसीसी भाषा के शब्द 'Environner' से हुई है। इसका अर्थ भी 'पड़ोस' या 'चारों तरफ से घेरना' होता है।
हालांकि, विज्ञान और भूगोल के दृष्टिकोण से यह परिभाषा बहुत सीमित है। व्यापक अर्थों में, पर्यावरण में वे सभी भौतिक, रासायनिक और जैविक परिस्थितियां शामिल हैं जो किसी भी जीव (चाहे वह सूक्ष्म बैक्टीरिया हो या विशालकाय मनुष्य) के जीवन, उसके विकास, उसकी शारीरिक संरचना और उसकी मृत्यु को प्रभावित करती हैं।
विभिन्न विद्वानों और संस्थाओं ने पर्यावरण को निम्नलिखित तरीकों से परिभाषित किया है:
- सी. सी. पार्क (C.C. Park) के अनुसार: "पर्यावरण का अर्थ उस संपूर्ण भौतिक और जैविक परिस्थितियों से है जो किसी जीव को एक निश्चित समय और स्थान पर घेरे रहती हैं।"
- भारत के पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अनुसार: "पर्यावरण के अंतर्गत जल, वायु और भूमि आते हैं, और इसके साथ ही वह अंतर्संबंध भी आता है जो जल, वायु, भूमि और मानव, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्म जीवों और संपत्ति के बीच मौजूद होता है।"
सरल शब्दों में, पर्यावरण प्रकृति की वह प्रयोगशाला है जहां निर्जीव (हवा, पानी, मिट्टी) और सजीव (पेड़, जानवर, इंसान) तत्व लगातार एक-दूसरे से बातचीत करते हैं और एक-दूसरे को आकार देते हैं।
पर्यावरण का क्षेत्र
(Scope of Environment)
पर्यावरण का दायरा अत्यंत विशाल और बहुआयामी है। यह हमारे घर के आंगन से शुरू होकर महासागरों की गहराइयों और अंतरिक्ष की उन ऊंचाइयों तक फैला हुआ है जहां तक वायुमंडल मौजूद है। इसे गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पर्यावरण के क्षेत्र को मुख्य रूप से चार परिमंडलों (Spheres) में विभाजित किया है:
1. स्थलमंडल (Lithosphere)
यह पृथ्वी की सबसे बाहरी ठोस परत है, जिसे हम भूपर्पटी (Crust) भी कहते हैं। यह चट्टानों, खनिजों और विभिन्न प्रकार की मिट्टियों से मिलकर बनी है।
- विस्तार और विविधता: स्थलमंडल हर जगह एक समान नहीं है। इसमें ऊंचे-ऊंचे हिमालय जैसे पर्वत, गहरी खाइयां, विशाल मरुस्थल, हरे-भरे मैदान और पठार शामिल हैं।
- पर्यावरणीय महत्व: यह वह मंच है जहां मानव सभ्यताएं बसती हैं। यही वह क्षेत्र है जो कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी प्रदान करता है। इसके अलावा, औद्योगिक विकास के लिए सभी आवश्यक खनिज और जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) इसी स्थलमंडल के गर्भ में छिपे हुए हैं।
2. जलमंडल (Hydrosphere)
पृथ्वी को 'नीला ग्रह' (Blue Planet) कहा जाता है क्योंकि इसकी सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा जल से ढका हुआ है। जल के इस संपूर्ण भंडार को जलमंडल कहते हैं।
- विस्तार: इसमें प्रशांत महासागर जैसे विशाल सागरों से लेकर छोटी नदियां, झीलें, तालाब, ध्रुवीय क्षेत्रों और ऊंचे पहाड़ों पर जमी बर्फ (ग्लेशियर), और जमीन के अंदर मौजूद भूजल (Groundwater) भी शामिल है।
- पर्यावरणीय महत्व: जल पृथ्वी पर जीवन की पहली शर्त है। जलमंडल न केवल करोड़ों जलीय जीवों (मछलियों, मूंगों, शैवालों) का घर है, बल्कि यह सूर्य की गर्मी को सोखकर पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखने (Climate Regulation) में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। जल चक्र (Water Cycle) के माध्यम से यह पूरे ग्रह पर वर्षा सुनिश्चित करता है।
3. वायुमंडल (Atmosphere)
पृथ्वी के चारों ओर लिपटी हुई गैसों, जलवाष्प और धूल के कणों की चादर को वायुमंडल कहते हैं। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण इसे अंतरिक्ष में उड़ने से रोकता है। वायुमंडल कई परतों में बंटा हुआ है—क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, और आयनमंडल।
- संरचना: इसमें नाइट्रोजन (लगभग 78%) और ऑक्सीजन (लगभग 21%) की प्रधानता है। इसके अलावा ऑर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, ओजोन, और हाइड्रोजन जैसी गैसें सूक्ष्म मात्रा में मौजूद हैं।
- पर्यावरणीय महत्व: वायुमंडल पृथ्वी के लिए एक सुरक्षा कवच (Protective Shield) की तरह काम करता है। समतापमंडल (Stratosphere) में मौजूद ओजोन परत (Ozone Layer) सूर्य से आने वाली घातक पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकती है। वायुमंडल के बिना पृथ्वी का तापमान दिन में भयंकर गर्म और रात में बर्फीला हो जाता, जिससे जीवन असंभव हो जाता।
4. जैवमंडल (Biosphere)
यह पर्यावरण का सबसे जीवंत और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जैवमंडल वह संकीर्ण पट्टी है जहां स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल तीनों आपस में मिलते हैं और एक ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जो जीवन का समर्थन करती है।
- विस्तार: यह समुद्र की सबसे गहरी खाइयों से लेकर वायुमंडल में कुछ किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ है।
- पर्यावरणीय महत्व: इस क्षेत्र में ही सभी 'पारिस्थितिकी तंत्र' (Ecosystems) पनपते हैं। यहां निर्जीव तत्व (हवा, पानी, प्रकाश) सजीव तत्वों (पौधों और जानवरों) को ऊर्जा देते हैं, और जीवन का चक्र बिना रुके चलता रहता है। जैवमंडल ही पृथ्वी को पूरे ब्रह्मांड में अब तक का ज्ञात एकमात्र जीवित ग्रह बनाता है।
पर्यावरण के प्रमुख तत्व
(Major Elements of Environment)
पर्यावरण का निर्माण करने वाले कारकों या तत्वों को मुख्य रूप से तीन विशाल श्रेणियों में बांटा जा सकता है। ये तत्व आपस में इतनी गहराई से गुंथे हुए हैं कि इन्हें अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता।
1. भौतिक या अजैविक तत्व (Physical / Abiotic Elements)
ये पर्यावरण के वे निर्जीव अंग हैं जो जीवन के लिए आधार और संसाधन तैयार करते हैं। अजैविक तत्व ही यह तय करते हैं कि किसी विशिष्ट स्थान पर किस प्रकार का जीवन पनपेगा।
- सौर ऊर्जा और प्रकाश: सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है। इसी की मदद से पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया द्वारा भोजन बनाते हैं, जो अंततः पूरी खाद्य श्रृंखला को ऊर्जा देता है।
- जलवायु और तापमान (Climate and Temperature): किसी स्थान की दीर्घकालिक मौसम स्थितियों को जलवायु कहते हैं। तापमान यह तय करता है कि किसी क्षेत्र में किस प्रकार के जीव रह सकते हैं। जैसे, सेब के पेड़ ठंडी जलवायु में उगते हैं, जबकि खजूर मरुस्थलीय गर्मी में।
- जल और आर्द्रता (Water and Humidity): वर्षा की मात्रा और हवा में नमी किसी भी क्षेत्र की वनस्पति को तय करती है। भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में भूमध्यरेखीय सदाबहार वन (जैसे अमेज़न) पाए जाते हैं, जबकि कम वर्षा वाले स्थानों पर घास के मैदान या रेगिस्तान।
- स्थलाकृति (Topography): भूमि का आकार कैसा है, यानी ढलान, ऊंचाई और दिशा। पहाड़ की जिस दिशा में सूरज की रोशनी सीधे पड़ती है, वहां की वनस्पति छाया वाले हिस्से से बिल्कुल अलग होती है।
- मिट्टी (Soil): मिट्टी की संरचना, उसका pH स्तर, और उसमें मौजूद खनिज तत्व (जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस) कृषि और जंगली वनस्पतियों की प्रकृति का निर्धारण करते हैं।
- गुरुत्वाकर्षण (Gravity): यह वह अदृश्य शक्ति है जो वायुमंडल, जलमंडल और स्थलमंडल की सभी चीज़ों को पृथ्वी से बांधे रखती है।
2. जैविक तत्व (Biological / Biotic Elements)
इस श्रेणी में पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवित जीव आते हैं, जिनमें इंसान भी शामिल है। जैविक तत्व सिर्फ पर्यावरण में रहते ही नहीं हैं, बल्कि वे इसे बदलते भी हैं। इन्हें उनकी भोजन प्राप्त करने की विधि के आधार पर तीन उप-वर्गों में बांटा जाता है:
- उत्पादक (Producers / Autotrophs): ये मुख्य रूप से हरे पेड़-पौधे, शैवाल और कुछ खास तरह के बैक्टीरिया होते हैं। ये पर्यावरण से जल, कार्बन डाइऑक्साइड और सौर ऊर्जा लेकर अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। पूरी दुनिया का जीवन इन्हीं पर निर्भर है।
- उपभोक्ता (Consumers / Heterotrophs): ये वे जीव हैं जो अपने भोजन के लिए पौधों या अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं।
- प्राथमिक उपभोक्ता: शाकाहारी जीव जो सीधे पौधे खाते हैं (जैसे गाय, हिरण, खरगोश, टिड्डे)।
- द्वितीयक और तृतीयक उपभोक्ता: मांसाहारी जीव जो शाकाहारियों या अन्य छोटे मांसाहारियों का शिकार करते हैं (जैसे मेंढक, सांप, शेर, चीता)।
- सर्वाहारी: जो पौधे और मांस दोनों खाते हैं (जैसे मनुष्य, भालू, कौवा)।
- अपघटक (Decomposers): इन्हें प्रकृति का 'सफाईकर्मी' कहा जाता है। इसमें कवक (Fungi) और सूक्ष्म जीवाणु (Bacteria) शामिल हैं। जब पौधे या जानवर मर जाते हैं, तो ये अपघटक उनके शरीर को सड़ा-गला कर उनके अंदर के खनिजों और पोषक तत्वों को वापस मिट्टी और हवा में मिला देते हैं। इसी से पोषण चक्र (Nutrient Cycle) पूरा होता है।
3. सांस्कृतिक या मानव-निर्मित तत्व
(Cultural / Man-made Elements)
यह पर्यावरण का वह हिस्सा है जिसे प्रकृति ने नहीं, बल्कि मनुष्य ने अपनी बुद्धि, तकनीक और सभ्यता के विकास के साथ बनाया है। मानव ने अपने आराम और विकास के लिए प्राकृतिक पर्यावरण में व्यापक बदलाव किए हैं।
- भौतिक बुनियादी ढांचा (Physical Infrastructure): इसके अंतर्गत मनुष्य द्वारा बनाए गए घर, गगनचुंबी इमारतें, सड़कें, रेलवे नेटवर्क, पुल, बांध, और औद्योगिक कारखाने आते हैं। इसे कई बार 'Technosphere' भी कहा जाता है।
- सामाजिक और आर्थिक ढांचा: मानव द्वारा बनाई गई संस्थाएं जैसे—परिवार, समाज, धर्म, अर्थव्यवस्था, बाज़ार, और राजनीतिक प्रणालियां। ये तत्व तय करते हैं कि मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करेगा।
- तकनीक और विज्ञान: खेती के उन्नत तरीके, जेनेटिक इंजीनियरिंग, परिवहन के साधन (हवाई जहाज़, कारें), और संचार नेटवर्क (इंटरनेट, सैटेलाइट)।
सांस्कृतिक पर्यावरण ने मनुष्य को बहुत सुविधा दी है, लेकिन इसके अत्यधिक और अनियंत्रित विस्तार ने प्राकृतिक पर्यावरण के सामने गंभीर चुनौतियां (जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई) भी खड़ी कर दी हैं।
मानव और पर्यावरण का बदलता संबंध
पर्यावरण का अध्ययन तब तक अधूरा है जब तक हम मानव और प्रकृति के बीच के संबंध को न समझें। इतिहास में इस संबंध को दो प्रमुख विचारधाराओं में देखा गया है:
- निश्चयवाद (Determinism): यह मानता है कि प्रकृति ही सर्वोपरि है। मनुष्य क्या खाएगा, कैसे कपड़े पहनेगा और कैसे घर बनाएगा, यह सब पर्यावरण तय करता है। प्राचीन काल में मनुष्य पूरी तरह प्रकृति के अधीन था।
- संभववाद (Possibilism): यह विचारधारा मानती है कि मनुष्य के पास बुद्धि और तकनीक है, जिससे वह पर्यावरण में बदलाव कर सकता है। इसी सोच ने कृषि, औद्योगीकरण और आधुनिक शहरों को जन्म दिया।
पर्यावरण की अन्य परिभाषाएं (Other Definitions of Environment)
- 1. प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक हर्षको विट्स के अनुसार,"पर्यावरण उन समस्त बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग है जो प्राणी के जीवन एवं विकास को प्रभावित करते हैं।"
- 2. इनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका के अनुसार,"पर्यावरण उन सभी बाहरी प्रभावों का समूह है जो जीवो को प्राकृतिक भौतिक एवं जैविक शक्ति से प्रभावित करते हैं तथा प्रत्येक जीव को आवृत्ति किए रहते हैं।"
- 3. प्रसिद्ध विद्वान दार्शनिक तोंस्ले के अनुसार,"चारों ओर पाई जाने वाली प्रभाव कारी दशाओं का वह योग जिसमें जीव रहते हैं वातावरण अथवा पर्यावरण कहलाता है।"
- 4. विश्वकोश के अनुसार, "पर्यावरण के अंतर्गत उन सभी दशाओं संगठन और प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है जो किसी जीव अथवा प्रजाति के उद्भव विकास एवं मृत्यु को प्रभावित करती है।"
- 5. शैक्षिक अनुसंधान विश्वकोश के अनुसार, "किसी के लिए यह निश्चित करना ठीक नहीं है कि पर्यावरण अध्ययन, भूगोल तथा नागरिक शास्त्र का योग मात्र है निश्चय ही इन विषयों से पर्याप्त सामग्री प्राप्त करता है; मगर यह उसी सामग्री को ग्रहण करता है जो, मानव के वर्तमान तथा दैनिक जीवन के संबंधों को स्पष्ट करती है।"
आज के समय में हमें इन दोनों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है, जिसे हम 'सतत विकास' (Sustainable Development) कहते हैं। इसका अर्थ है पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना अपनी जरूरतों को पूरा करना।
निष्कर्ष
पर्यावरण केवल हमारे अध्ययन का एक विषय मात्र नहीं है; यह वह जीवन रेखा है जो हम सभी को एक साथ बांधती है। स्थलमंडल से लेकर वायुमंडल तक, और सूर्य के प्रकाश से लेकर एक छोटे से जीवाणु तक—हर एक तत्व एक विशाल तंत्र का हिस्सा है।
दुर्भाग्य से, मनुष्य ने अपने अल्पकालिक लाभ और अनियंत्रित विकास की दौड़ में इस प्राकृतिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming), ओजोन परत में छिद्र, और अनगिनत प्रजातियों का विलुप्त होना इस बात का प्रमाण है कि पर्यावरण के तत्व असंतुलित हो रहे हैं।
यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां इस खूबसूरत पृथ्वी पर स्वस्थ जीवन जी सकें, तो हमें पर्यावरण के इन सभी तत्वों के महत्व को समझना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, बल्कि उसके एक छोटे से हिस्से हैं। प्रकृति की रक्षा करना वास्तव में स्वयं मानव जाति के भविष्य की रक्षा करना है।
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