हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो । चंदबरदाई । Hindi Ka Pratham Maha Kavya Prithiviraj Raso
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| हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो । चंदबरदाई । Hindi Ka Pratham Maha Kavya Prithiviraj Raso |
हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो : चंदबरदाई। पात्र परिचय एवं ऐतिहासिकता
मिश्र बंधुओं ने लिखा है-"हिंदी का वास्तविक प्रथम महाकवि चंदबरदाई को ही कहा जा सकता है।" शुक्ल जी के अनुसार चंदबरदाई, पृथ्वीराज चौहान का राजकवि ही नहीं अपितु उनका सखा और सामंत भी था। वह बहुत प्रतिभाशाली, दूरदर्शी, वीर तथा स्वामिभक्त कवि था। स्वामी के हितार्थ ही चंद ने अपना बलिदान किया था। इनके जीवन को पृथ्वीराज के जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। ये पृथ्वीराज के साथ युद्ध में,आखेट में, सभा में, यात्रा में सदैव रहते थे और जहां जो बाते हुआ करतीं थी उन सब में ये सम्मलित रहा करते थे।
महामोहपाध्याय पं० हरप्रसाद शास्त्री के अनुसार चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था। इनके जन्म काल को लेकन विद्वान एक मत नहीं हैं। शुक्ल जी ने इनका जन्म वर्ष 1168 ई. मानते हुए लिखा है कि- "रासो के अनुसार यह भट्ट जाति के जगात नामक गोत्र के थे। इनके पूर्वजों की भूमि पंजाब थी जहां लाहौर में उनका जन्म हुआ था। इनका और महाराज पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ था और दोनों ने एक ही दिन यह संसार भी छोड़ा था।"
हरप्रसाद शास्त्र जी को नानूराम भाट से चंद का वंश वृक्ष प्राप्त हुआ था। नानूराम भाट स्वयं को चंद का वंशज मानता था। उसके अनुसार चंद के चार पुत्र थे, जिनमें से चतुर्थ पुत्र का नाम जल्ल था। जिस समय पृथ्वीराज को मोहम्मद गौरी बंदी बनाकर अपने देश ले जा रहा था। उस समय चंद भी महाराज के साथ गए थे और अपनी पुस्तक पृथ्वीराज रासो को अपने पुत्र जल्ल को सौंप गया था। इस संबंध यह उक्ति प्रसिद्ध है- "पुस्तक जल्हण हत्थ दै, चलि गज्जन नृप काज" कहा जाता है कि जल्ल ने चंद के अधूरे महाकाव्य को पूरा किय था।
पृथ्वीराज रासो में ढाई हजार पृष्ठ और 69 समय (सर्ग या अध्याय) हैं। जिस समय की यह कृति है उस समय के लगभग सभी छंदों का प्रयोग इसमें हुआ है। फिर भी मुख्य छंद कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या हैं।
'कयमास वध' इसका एक महत्वपूर्ण सर्ग है। पृथ्वीराज रासो के चार संस्करण प्रसिद्ध हैं। जो कि डॉ. नगेन्द्र द्वारा संपादित ' हिंदी साहित्य का इतिहास ' नामक ग्रंथ में कुछ इस प्रकार दिए गए हैं-
- सबसे बड़ा संस्करण वह है जिसका प्रकाशन नागरी प्रचारिणी सभा काशी से हुआ है तथा जिसकी हस्तलिखित प्रतियां उदयपुर के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। सभा ने 1585 ई. में लिखित प्रति के आधार पर रासो का संपादन कराया था। इस संस्करण में 69 समय तथा 16306 छंद हैं।
- द्वितीय रूप में उपलब्ध पृथ्वीराज रासो 7000 छंदों का काव्य माना जाता है इसका प्रकाशन नहीं हुआ किंतु अबोहर एवं बीकानेर में इसकी प्रतियां सुरक्षित हैं जो 17 वीं शताब्दी ईसवी में लिखी गई हैं।
- तीसरा लघु संस्करण 3500 छंदों का है जिसमें केवल 19 समय हैं। इस संस्करण की हस्तलिखित प्रतियां बीकानेर में सुरक्षित हैं।
- चौथा संस्करण सबसे छोटा है इसमें केवल 1300 छंद हैं। इसी को डॉ. दशरथ शर्मा आदि विद्वान मूल रसो मानते हैं।
पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता संदिग्ध है। अत: कुछ विद्वान इसे प्रामाणिक तथा कुछ अप्रामाणिक मानते हैं। यह कृति ऐतिहासिक तथ्यों की कसोटी पर खरी नहीं उतरती। इस दृष्टि से यंह ग्रंथ हिंदी साहित्य के इतिहास में सर्वाधिक विवादास्पद रहा है।
पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता की प्रामाणिकता यह विवाद इतना बढ़ गया कि विद्वानों के वर्ग तैयार हो गए। कुछ विद्वान इसकी प्रामाणिकता को लेकर तर्क देते हैं तो वहीं कुछ विद्वान इसकी अप्रामाणिकता को लेकर तर्क देते हैं।वस्तुतः आरंभ में यह ग्रंथ विवादास्पद नहीं था किंतु सन् 1875 ई. में डॉ. बूलर ने 'पृथ्वीराज विजय' ग्रंथ के आधार पर इसे अप्रमाणिक रचना घोषित कर दिया।
पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता और अप्रामाणिकता को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं-
- श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, मोहनलाल विष्णु लाल पांड्या, कर्नल टॉड आदि विद्वान इसे प्रामाणिक मानते हैं।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, मुंशी देवी प्रसाद, कविराज श्यामलदास, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, बूलर मुरारी दान आदि विद्वान इसे अप्रामाणिक मानते हैं।
- मुनिजन विजय, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ सुनीति कुमार चटर्जी, डॉ दशरथ ओझा आदि विद्वान इसे अर्धप्रामाणिक घोषित करते हैं।
- नरोत्तमदास स्वामी के अनुसार चंद ने पृथ्वीराज के दरबार में रह कर मुक्तक रूप में 'रासो' की रचना की थी।
पृथ्वीराज रासो को प्रामाणिक-अप्रामाणिक घोषित करने वालों के तर्कों पर प्रकाश डालना भी समीचीन रहेगा। डा. नगेन्द्र द्वारा संपादित ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' के अनुसार अप्रमाणिकता के लिए दिए जाने वाले तर्क कुछ इस प्रकार हैं-
- 'रासो' में उल्लिखित घटनाएं और नाम इतिहास से मेल नहीं खाते। इसमें परमार, चालुक्य और चौहान क्षत्रियों को अग्निवंशी माना गया है जबकि वह सूर्यवंशी प्रमाणित हुए हैं।
- पृथ्वीराज का दिल्ली गोद जाना, संयोगिता स्वयंवर आदि घटनाएं इतिहास से मेल नहीं खातीं।
- अनंगपाल, पृथ्वीराज तथा बीसलदेव के राज्यों के संदर्भ में अशुद्ध हैं।
- पृथ्वीराज की मां का नाम कर्पूरी था, जो रासो में कमला बताया गया है।
- पृथ्वीराज की बहन पृथा का विवाह मेवाड़ के राणा समर सिंह के साथ बताया गया है जो अशुद्ध है ।
- पृथ्वीराज द्वारा गुजरात के राजा भीम सिंह का वध भी इतिहास संबंध नहीं है ।
- रासो में पृथ्वीराज के चौदह विवाहों का वर्णन है , जो इतिहास से मेल नहीं खाता।
- पृथ्वीराज के हाथों गौरी की मृत्यु की सूचना भी इतिहास संबंध नहीं है ।
- पृथ्वीराज द्वारा सोमेश्वर का वध भी इतिहास सम्मत नहीं है ।
- रासो में दी गई तिथियां अशुद्ध है सभी तिथियों में इतिहास की तिथियों से प्राय: लगभग 90-100 वर्षों का अंतर है।
प्रमाणिकता के लिए दिए जाने वाले तर्क :
- डॉ दशरथ शर्मा का मत है कि इसका मूल रूप प्रक्षेपों में छिपा हुआ है। इधर जो लघुतम प्रतियां मिली हैं , उनमें इतिहास संबंधी अशुद्धियां नहीं हैं।
- घटनाओं में 90-100 वर्षों का जो अंतर है। वह संवत् की भिन्नता के कारण है। मोहनलाल विष्णु लाल पांड्या ने 'नंद संवत' की कल्पना की है और उसके अनुसार तिथियां भी शुद्ध सिद्ध होती हैं।
- डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि पृथ्वीराज रासो में 12 वीं शताब्दी की भाषा की संयुक्ताक्षरमयी अनुस्वारांत प्रवृत्ति मिलती है।जिससे यह 12 वीं शताब्दी का ग्रंथ सिद्ध होता है।
- रासो इतिहास ग्रंथ ना होकर काव्य रचना है अतः उसने इतिहास का सत्य खोजना और उसके ना मिलने पर उसे अप्रामाणिक घोषित करना अनुचित है।
- डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह मत भी है कि पृथ्वीराज रासो की रचना शुक-शुकी संवाद के रूप में हुई थी।अत: जिन सर्गो में यह शैली नहीं मिलती, उन्हें प्रक्षिप्त मानना चाहिए। यदि यह तर्क मान लिया जाए तो वे ही अंश प्राय: प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं , जिनमें इतिहास विरुद्ध तथ्य हैं।
- जिन लोगों ने रासो में अरबी-फारसी के शब्दों का प्रयोग देखकर उसे जाली ग्रंथ माना है। उनके विरुद्ध यह तर्क दिया जाता है कि चन्द लाहौर का निवासी था। वहां उस समय मुसलमानों का प्रभाव आ चुका था, अतः उसकी भाषा में अरबी-फारसी के शब्दों का मिश्रण होना सहज है।
★ आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित हिंदी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रंथ में वर्णित पृथ्वीराज रासो की कहानी-
- इस ग्रंथ के अनुसार दिल्ली के तुंवर (तोमर) राजा अनंगपाल की दो कन्याएं थी। जिनका नाम क्रमशः सुंदरी और कमला था। सुंदरी का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल के साथ हुआ और इस संयोग से जयचंद राठौर की उत्पत्ति हुई। वहीं दूसरी कन्या कमला का विवाह अजमेर के चौहान सोमेश्वर के साथ हुआ। जिनके संयोग से पृथ्वीराज की उत्पत्ति हुई। आनंदपाल ने अपने नाती पृथ्वीराज को गोद ले लिया जिससे कि अजमेर और दिल्ली का राज एक हो गया ।
- यह बात जयचंद को अच्छी नहीं लगी और उसने एक दिन राजसूय यज्ञ करके सब राजाओं को यज्ञ के भिन्न-भिन्न कार्य करने के लिए निमंत्रित किया और इसके साथ ही अपनी कन्या संयोगिता का स्वयंवर रचा। राजसूय यज्ञ में सब राजा आए पर पृथ्वीराज नहीं आए। इस पर जयचंद ने चिढ़कर पृथ्वीराज की एक स्वर्ण मूर्ति द्वारपाल के रूप में द्वार पर रखवा दी। संयोगिता का अनुराग पहले से ही पृथ्वीराज पर था।
- अतः जब वह जयमाल लेकर रंगभूमि में आई तब उसने पृथ्वीराज की मूर्ति को ही माला पहना दी। इस पर जयचंद ने उसे घर से निकाल कर गंगा किनारे के महल में भेज दिया । इधर पृथ्वीराज के सामंतों ने आकर यज्ञ विध्वंस किया। फिर पृथ्वीराज ने संयोगिता से गांधर्व विवाह किया और अंत में वे उसे हर ले गए। रास्ते में जयचंद की सेना से बहुत युद्ध हुआ , पर संयोगिता को लेकर पृथ्वीराज कुशलतापूर्वक दिल्ली पहुंच गए। वहां भोग विलास में ही उनका समय बीतने लगा राज्य की रक्षा का ध्यान न रह गया।
- बल का बहुत कुछ ह्त्रास तो जयचंद तथा और राजाओं के साथ लड़ते लड़ते हो चुका था और बड़े बड़े सामंत मारे जा चुके थे।अच्छा अवसर देख शहाबुद्दीन चढ़ आया, पर हार गया और पकड़ा गया । पृथ्वीराज ने उसे छोड़ दिया।वह बार-बार चढ़ाई करता रहा और अंत में पृथ्वीराज पकड़कर गजनी भेज दिए गए। कुछ काल के पीछे कवि चन्द भी गजनी पहुंचे।
- एक दिन चंद के इशारे पर पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण द्वारा शहाबुद्दीन को मारा और फिर दोनों एक दूसरे को मार कर मर गए। शहाबुद्दीन पृथ्वीराज के बैर का कारण यह लिखा गया है कि शहाबुद्दीन अपने यहां की एक सुंदरी पर आसक्त था, जो एक दूसरे पठान सरदार हुसेन शाह को चाहती थी। जब यह दोनों शहाबुद्दीन से तंग हुए तब हारकर पृथ्वीराज के पास भाग आए।
- शहाबुद्दीन ने पृथ्वीराज के यहां कहला भेजा कि उन दोनों को अपने यहां से निकाल दो। पृथ्वीराज ने उत्तर दिया कि शरणागत की रक्षा करना क्षत्रियों का धर्म है। अतः इन दोनों की हम बराबर रक्षा करेंगे। इसी बैर से शहाबुद्दीन ने दिल्ली पर चढ़ाइयां कीं। यह तो पृथ्वीराज का मुख्य चरित्र हुआ इसके अतिरिक्त बीच-बीच में बहुत से राजाओं के साथ पृथ्वीराज के युद्ध और अनेक राज्यकन्याओं के साथ विवाह की कथाएं रासो में भरी पड़ी हैं।
चरित्र-चित्रण
पृथ्वीराज
- पृथ्वीराज इस महाकाव्य का नायक है। वह धीर,पराक्रमी और विनयशील है।वह अपने गुरूजनों का सम्मान करता है। एक बार जब जयचंद राजसूय यज्ञ करवाता है। तो वह अपने दूतों को, राजसूय यज्ञ में सम्मलित होने हेतु पृथ्वीराज को निमंत्रण भिजवाता है। जब दूत निमंत्रण के लिए आते हैं तो वंहा पर पृथ्वीराज के गुरूजन भी होते हैं जिन्हें देखकर वह सकुच जाता है, जिसके कारण वह कोई उत्तर नहीं दे पाता। तब उसका एक गुरूजन गोविंद राज उत्तर देता हुआ कहता है कि-
"बोलउ न वयण प्रथिराज तांहि।
संकरिउ सिंध गुरुजन चाहि।।"
- पृथ्वीराज एक कर्तव्य परायण राजा है। वह कर्तव्य के सामने अपने प्राणों की आहुति हेतु सदैव तत्पर रहता है।जयचंद की पुत्री उसे सच्चे हृदय से प्रेम करती है। यह बात पृथ्वीराज को तब पता चलती है जब चर उसे कन्नौज का समाचार देता है-
"संयोगि जोग वर तुम्ह आज।व्रत लिअउ वरण प्रथीराज राज।।"
- जब पृथ्वीराज को यह ज्ञात होता है कि संयोगिता उसे सच्चे हृदय से प्रेम करती है और जयचंद उसका विवाह कहीं और करना चाहता है तो उसका मन अशांत हो जाता है। जयचंद जब पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसकी स्वर्ण- प्रतिमा को द्वारपाल के स्थान पर अपने द्वार पर स्थापित करता है तो संयोगिता उस मूर्ति की ही जयमाल डाल देती है।
- इस पर जयचंद उसे घर से निकालकर गंगा किनारे के महल में भैज देता है। पृथ्वीराज का जयचंद के साथ जो युद्ध होता है वह उसकी काम-लिप्सा न होकर संयोगिता के प्रति अपने कर्तव्य के निर्वाह के रूप में होता है। जब पृथ्वीराज संयोगिता और जयचंद के द्वारा किए गए अपमान के कारण एक मानसिक संघर्ष से गुजर रहा होता है तो वह अपने राजभवन के कार्य को अपने श्रेष्ठ सामंत कयमास को सौंप कर अपना जी बहलाने के लिए आखेट में व्यस्त रहता है-
"तिहि तप आखेटक भमइ थिर न रहइ चहुवान।
वर प्रधान जुग्गिनिपुरह धर रष्षइ परवान।।"
- किंतु जब पृथ्वीराज को पता चलता है कि कयमास राजभवन के नियमों का उल्लंघन कर उसकी दासी पर अनुरक्त होकर उसके कक्ष में प्रवेश करता है। तो वह क्रोध में आकर कयमास और उस दासी वध कर देता है। यंहा पर पृथ्वीराज जिस मनासिक स्थिति से गुजर रहा था उस दौरान कयमास के द्वारा किए गए राजभवन के उल्लंघन के सह पाना कठिन था।
- जिसके कारण वह उसका वध कर देता है किंतु जब पृथ्वीराज का मानसिक संघर्ष खत्म होता है तो वह पश्चाताप भी करता है। पृथ्वीराज का जीवन ही वीरता की अनुपम कथा है। जब पृथ्वीराज कन्नौज में संयोगिता के साथ विवाह करने के उपरांत जयचंद से युद्ध चाहता है तो सांमत देखते हैं कि कन्नौज में रहकर युद्ध नहीं किया जा सकता।वे पृथ्वीराज को सुरक्षित दिल्ली पहुंचाने की बात करते हैं किंतु पृथ्वीराज इस प्रस्ताव को ठुकरा कर कहता है कि-
"मति घट्टी सामंत मरण हउ मोहि दिषावहु।जम चीठी विणु कदन होइ जउ तुमउ बतावहु।तुम गंजउ भर भीम तास गव्वह मयमत्ता ।मइ गोरी साहव्वदीन सरवर साहंत।मुह सरणहि हींदू तुरक तिह सरणागत तुम करहु।बूझिअइ न सूर सामंत हो इतउ बोझ अप्पन धरहु।।"
किंतु जब पृथ्वीराज का बाल सखा चंद सामंतो के प्रस्ताव का समर्थन करता है तब पृथ्वीराज कहता है कि -
"मिट्यउण जाइ कहणो वय कवि चंद सार सा मंत।"
- अर्थात चंद का कथन मेरे लिए अमिट है।
- पृथ्वीराज की यह वीरता और कर्तव्य के प्रति सजगता संयोगिता के साथ विवाह करने के उपरांत कुछ शिथिल पड़ जाती है। वह दिन-रात संयोगिता के साथ रति क्रिडा में मग्न रहता है। भोग विलास के चक्कर में राज-काज पर भी ध्यान नहीं देता। जिससे कि गुरुजन, बांधव ,प्रजागण आदि सब उससे खिन्न हो जाते हैं। किंतु जब उसका बाल सखा चंद उसे शहाबुद्दीन के होने वाले आक्रमण की सूचना देता है तो उसकी निद्रा टूटती है। उसे अपने कर्तव्य का बोध होता है।
- फिर वह संयोगिता के प्रति अपने मोह को भुलाकर कर्तव्य का स्मरण कर अपनी पुरानी अवस्था में आ जाता है। संयोगिता उसे काम-सुख में प्रवृत्त करने के लिए आमंत्रित करती है किंतु वह उसे त्याग देता है और इस प्रकार पृथ्वीराज पुन: अपने कर्तव्य में उसी प्रकार स्थित हो जाता है, जिस प्रकार कोई नट वेष बदलकर आ जाता है-
"सुणि कग्गरु पिट्टउ सुकर धर रष्षई गुरु भटृट।
तरकि तोन सजियउ स किरि जिम वेष छंडि सू नट्ट।।"
- पृथ्वीराज की सेना शहाबुद्दीन की सेना से बहुत कम थी। फिर भी पृथ्वीराज उसके आगे समर्पण न करते हुए अपनी पूरी ताकत के साथ उससे तब तक लड़ता है जब तक वह बंदी नहीं बना लिया जाता। शहाबुद्दीन द्वारा अंधा किए जाने पर भी वह अपना सर नहीं झुकाता।
- जिसके कारण शहाबुद्दीन उसे थानें में रख देता है। जब पृथ्वीराज निराश हो जाता है तो चंद उसे वीरता का पाठ पढ़ाता है। साथ ही उसे अपने शत्रु से प्रतिशोध के लिए भी तैयार करता है। जिसे सुनकर उसकी नशों में नवजीवन का संचार होता है। पृथ्वीराज की अंतिम झांकी बाण-संधान से पूर्व मिलती है। कवि कहता है कि चंद का मुख चांद के समान हो रहा था और राजा के मन की (संधि) शंका भी मलिन हो चुकी थी।
"इलि घसि पानिं पविस्ट किय सिंगिनि सर गुन बंधि।चरचि चंद मुष चंद भयु मलिय राज मन संधि।।"
शहाबुद्दीन के मरते ही पृथ्वीराज भी इस संसार से विदा लेता है। कवि के अनुसार-
"मरन चंद वरदिआ राज धुनि साह हन्यह सुनि ।पुहपंजलि असमान सीस छोड़ी त देवतनि।मेछ अबध्धित धरणि धरणि नवत्रयी सुहस्सिग।तिनहि तिनहि सं जोति जोतिहि संपत्तिग।"
- अर्थात- देवताओं ने उसके सिर पर पुष्पांजलि छोड़ी, जो धरती म्लेच्छों से आबद्ध हो गई थी अब नववधू के समान हंस पड़ी, तृण (शरीर के भौतिक तत्व) तृणों (भौतिक तत्वों) को तथा ज्योति (जीव) ज्वोति (परमात्मा) को संप्राप्त हुए।
संयोगिता
- संयोगिता कन्नौज के राजा विजयपाल के पुत्र जयचंद की पुत्री है। संयोगिता अपूर्व रूप की धनी है। संयोगिता का परिचय कवि ने कुछ इस प्रकार किया है-
जब अंकुर करि पानि चराबति वच्छ मृगु।मनु मानिनि मिस इंदु आनंद देषि दृगु।सहि सहचरि ति परसपर वत्तु किअ।सुभ सँजोगि संजान जानहु मनमथ्य किअ।।
- अर्थात संयोगिता अंकुरों को हाथ में लेकर मृग-वत्सों का चरा रही है,और ऐसी लग रही है मानो उस मानिनि के मिस इंदु ही (मृग-शावकों को) नेत्रों से देखकर आननंदित हो रहा हो , उसकी सखियां और सहचरियां परस्पर बातें कर रही हैं कि शुभा संयोगिता के संयोग लिए अर्थात विवाह के लिए विधाता ने मानो मन्मथ को ही तैयार किया होगा।
- यंहा पर कवि ने संयोगिता को मानिनि कहा है। मानिनि से तात्पर्य है मान करने वाली या अभिमान करने वाली स्त्री।
- जब संयोगिता पृथ्वीराज से विवाह करने का निश्चय करती है तो वह अपने फैसले पर अडिग रहती है। जयचंद उसे इस फैसले से विरत करने का भरसक प्रयास करता है। वह दासियों को भी नियुक्त करता है किंतु दासियां भी उस अपने इस फैसले से विरत करने में असमर्थ सिद्ध होती हैं। संयोगिता यह संकल्प लेती है कि चाहे उसे सौ जन्म ही क्यों न लेने पड़े वह पृथ्वीराज का ही वरण करेगी-
"न मो राजन संवादे न मो गुरुजनागरे।
वरमेकं सयं नेह अन्यथा पृथिराजए।।"
जयचंद उसके इस हठ के कारण उसे गंगा तट के एक अन्य आवास पर भैज देता है। जहां वह अकेले रहती है। जब संयोगिता को पृथ्वीराज का प्रथम दर्शन होता है और वह किसी के मुख से पृथ्वीराज का नाम सुनती है तो उसके शरीर में प्रेम के सात्विक अनुभाव प्रकट हो जाते हैं-
"सुनि रव सुंदरी अभ्भ तन स्वेद कंप सुर भंग।मनु कमलिनि कल संभरी अभ्रित किरन तन रंग।।"
संयोगिता के इस प्रेम रूप को देखकर उसकी सखी उसे सतर्क करती हुई कहती है कि जब यह निश्चय हो जाए कि वह पृथ्वीराज ही है तभी वह अपने कदमों के आगे बढाए। निश्चय हो जाने पर संयोगिता की एक सखी पृथ्वीराज को उससे मिलाती है। पृथ्वीराज जब चला जाता है तो संयोगिता विरह की अग्नि में जलने लगती है।
उस का मन मिलन की चाह में विचलित होने लगता है।कामाग्नि पृथ्वीराज के दर्शन से ही जल उठती है।वह बिन पानी मछली के समान हो गई है। किंतु इसके साथ ही संयोगिता के विरांगना रूप की झलक भी मिलती है। जब पृथ्वीराज पुन: उसके पास आता है तो संयोगिता को लगता है वह युद्ध से विमुख हो गया है और कहती है- जिस प्रिय जन की ओर लोक की उंगलियां उठें ,उस प्रिय जन से क्या काम ?
- जिहि प्रिय तन अंगलि फिरई तिंहिं प्रियजन कहा कज्जा।"
किंतु जब संयोगिता कन्नौज से दिल्ली आती है तो उसका रूप ही परिवर्तित हो जाता है। जीवन की सार्थकता उसे काम में नजर आने लगती है। उसका विलासिनी रूप उप पर हावी होने लगता है। वह पृथ्वीराज को कहीं नहीं जाने देती, दिन-रात वे दोनों काम-केली में मग्न रहते हैं।राज-काज की तरफ से भी पृथ्वीराज पूरी तरह से विमुख हो जाता है और यही उसके सर्वनाश के कारण भी बनता है।
शहाबुद्दीन जब उस पर आक्रमण करता है तो चंद उसे इस भोग निद्रा से जगाता है किंतु संयोगिता उसे रोकती है और कहती है कि वही धन धन है जिसका भोग किया जा सके,वही सुख सुख है जिसमें काम का आरोह हो,काम-विहीन जीवन संसार में मरण-तुल्य है-
"कह सु प्रियह पउमिनिया कंत धनु धरउ तउ न धनु।सुष सुषमार आरोहु असर संसार मरन मन।।"
इस प्रकार कवि ने संयोगिता के चरित्र को एक कामिनी के रूप में चित्रित किया है। जो राजा को आपने कर्तव्य से विमुख कर देता है। अत: जीवन में संतुलित और अनुशासित काम ही जीवन को सार्थक बनाता है।
चंद
पृथ्वीराज रासो के तृतीया सर्ग ' कयमास वध' में जब पृथ्वीराज आखेट से लोटकर सभा बुलाता है तो चंद में उपस्थित होकर राजा को आशीर्वाद देता है। चंद का प्रथम आगमन यहीं होता है। चंद को कयमास वध की सारी घटना सरस्वती स्वप्न में सुना देती है। जब चंद, पृथ्वीराज से कयमास की घटना के बारे में पूछता है वंहा उसकी निर्भीकता के दर्शन भी होते हैं क्योंकि कवि कहता है कि पृथ्वीराज से प्रश्न पूछना और उत्तर के लिए हठ करना फणींद्र के मुख में उंगली देने के समान है-
"हठि लग्गउ चहुआन निप अंगलि मुनष फणिंदु।तिहु पुरि तुअ मति संचरइ सु कहे बनइ कवि चंदु।।"
इस प्रकार हम देखते हैं कि चंद साहसी और निर्भीक था। इसी कारण पृथ्वीराज जैसे उग्र स्वभाव वाले ने उसे सारे अधिकार दे रखे थे कि किसी भी प्रकार से वह उसे मार्ग पर लाने का प्रयास कर सकता है।। कथा में इसके उदाहरण जगह-जगह पर मिलते हैं। कन्नौज से दिल्ली की ओर पृथ्वीराज को वही मोड़ता है। साथ ही काम-वासना से लिप्त राजा को सही मार्ग पर लाने के लिए वही संदेश भेजता है-
"गोरी रत्तउ तुव धरा तुं गोरी अनुरत्त।"
जब पृथ्वीराज को मोहम्मद गोरी बंदी बनाकर ले जाता है तो साथ में चंद भी जाता है और चंद उसे प्रतिशोध लेने के लिए प्रेरित करता है । किंतु जब राजा के मन में दुविधा देखता है तो वह कहता है कि कयमास के साथ तुमने जो किया था , वही तुम्हारे साथ हो रहा है। जिस विलासिता के कारण कयमास के प्राण उसने लिए थे, उसी विलासिता का परिणाम उसे स्वयं भोगना रहा है-
"जि कछु दियउ कयमास किअउ अप्पनउ सु पायउ।सोई संभरी नरेसु। तुहि ज अम्मरपुर आयउ।विधना बिधान मेटइ कवन। दीनमान दिन पाइयइ।सर एक फोरि संभरि धनी सत्तहि सबुद गमाइथइ।।"
चंद सदैव पृथ्वीराज के सुख में,दुख में,हर्ष में और विषाद में साथ रहता था। ऐसी मित्रता दुर्लभ ही मिलती है। जब जयचंद, पृथ्वीराज का अपमान करता है तब पृथ्वीराज अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए अपने प्राणोत्सर्ग का संकल्प लेता है। उस समय दोनों मिलकर खूब रोते हैं-
"दोइ कंठ लग्गिय गहन गहन नयनह जल गल न्हांनु।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि चंद और पृथ्वीराज का चरित्र एक-दूसरे में इतना मिला हुआ है कि उन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अन्य पात्र
कवि ने जयचंद में वीरता का वैसा विकास नहीं दिखाया है जैसा पृथ्वीराज में दिखाया था। एक स्थान पर कवि जयचंद और पृथ्वीराज वास्तविक शूर है वहीं जयचंद अपनी पारसीक सेना से शूर बना है-
"सत भट किरण समूरउ सुरंगो अरेन जां न आयेस।जोगिनिपुर पति। सेरो पारस मिसि पंगु रायेस ।।"
पृथ्वीराज रासो में शहाबुद्दीन के चरित्र में वीरता कम और निरंकुशता के दर्शन अधिक होते हैं।वह पृथ्वीराज को पराजित करने के बाद उसे बंदी बनाता है और उसकी आंखें भी निकलवा देता है। वहीं पृथ्वीराज ने उसे बंदी बनाकर कई बार छोड़ दिया था। किंतु चंद युक्तियों के माध्यम से पृथ्वीराज के द्वारा शहाबुद्दीन का वध करवा देता है और अंत में स्वयं भी मर जाता है।
कयमास वध की अंतर्वस्तु
महाकवि चंदवरदाई ने जिस युग में अवतीर्ण होकर काव्य रचना का कार्य आरम्भ किया था , वह हिंदी साहित्य के आदिकाल के नाम से जाना जाता है। चंदवरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो इस युग की सर्वोत्कृष्ट रचना है।यह एक विशालकाय महाकाव्य है।जो कि हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम महाकाव्य कहलाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-
" चंद हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।"
यह ग्रंथ कवि चंद की इतिहास एवं राजनीति, धर्म एवं ज्योतिष, साहित्य एवं काव्य-शास्त्र, पुराण एवं दर्शन, व्याकरण एवं छंद शास्त्र, तंत्र-मंत्र एवं सिद्धियां शास्त्रार्थ एवं युद्ध कौशल आदि से संबंधित अद्भुत योग्यता का परिचायक है।कवि ने इस ग्रंथ में वीर और श्रृंगार रस का अत्यंत मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है।
साथ ही इसमें जो आखेट वर्णन, युद्ध वर्णन एवं प्रकृति चित्रण दिखाई देता है वह अत्यंत ही साजीव है। इसका नामकरण इसके चरित्र नायक पृथ्वीराज के आधार पर किया गया है तथा शेष सर्गों के नाम घटना विशेष के आधार पर दिए गए हैं । कयमास वध इस महाकाव्य का एक अंश है। पृथ्वीराज चौहान के शूर सामंतों का एक बड़ा वर्ग था। उनमें से रासोकार ने नौ के नाम विशेष रूप से महत्व के कहे हैं। उनके नाम हैं-कन्ह, चामुंडराया, हरिसिंह, वीरसिंह, गुरूराम,सलखनी, कनकराय, रामराय और केमास।
इनमें से तीन पृथ्वीराज के अधिक निकट और विश्वासपात्र थे- कन्ह, गुरूराम, और केमास। केमास योद्धा होने के साथ-साथ पृथ्वीराज का मंत्री भी था और प्रबंधक भी। पृथ्वीराज चौहान के स्थान पर वह राज्य कार्य की देखभाल भी करता था। इस प्रकार केमास बहुत उच्च गुणों से युक्त एक श्रेष्ठ सामंत था। वह वीर और साहसी होने के साथ ही पृथ्वीराज चौहान का हितेषी और विश्वासपात्र भी था।
'कयमास वध' पृथ्वीराज रासो का तृतीय सर्ग है। कयमास वध में पृथ्वीराज के शूर सामंत और एक जिम्मेदार मंत्री का, राजा पृथ्वीराज द्वारा वध किया जाना वर्णित है। इस संदर्भ में यह ध्यान देना आवश्यक है कि पृथ्वीराज चौहान दूसरों की थोड़ी सी भी त्रुटि को अपनी आंखों से ओझल नहीं करता था। कयमास जब राजभवन के नियमों का उल्लंघन कर उसकी की दासी पर अनुरक्त होकर उसके कक्ष में प्रवेश करता है तो पृथ्वीराज उसका वध कर देता है।
माता प्रसाद गुप्त द्वारा संपादित 'कयमास वध' की कथा का आरंभ वंहा से होता है जंहा पृथ्वीराज विरह की अग्नि से पीड़ित है। उसका यह विरह दोहरे रूप में मिलता है। एक तो वह सामान्य जन की भांति अपनी प्रेमिका के विरह में दुखी है। दूसरा जयचंद ने उसे अपमानित करने के लिए द्वारपाल पर उसकी स्वर्ण प्रतिमा को स्थापित किया है। पृथ्वीराज को संयोगिता का विरह तप्त कर रहा था। जिसे भुलाने के लिए और कन्नौज जाने का अवसर निकालने की चिंता के कारण वह अपना समय आखेट में बिताया करता था। चंद पहले पद में वर्णित करते हैं:-
" तिहि तप आखेटक भमई थिर न रहई चहुवान।"
अर्थ-पृथ्वीराज उसके विरह ताप के कारण आखेट में व्यस्त रहता था और कहीं भी स्थिर नहीं रहता था।
पृथ्वीराज ने अपने प्रधान सामंत शूर कयमास को योगिनीपुर का राजकार्य सौंप रखा था:-
" वर प्रधान जुग्गिनि पुरह धर रष्षइ परवान।"
अर्थ- योगिनीपुर(दिल्ली) में धरा की रक्षा उसका क्षेष्ठ प्रधान(अमात्य) प्रमाण रूप से कर रहा था।
कयमास जोकि पृथ्वीराज का प्रिय प्रधान अमात्य था। कवि वर्णन करता है यह दैव की इच्छा थी कि वह कयमास काम के वशीभूत हो गया-
"सा मंत्री कयमास काम अंधा देवी विचित्र गति।"
अर्थ-वह मंत्री कयमास कामांध हो गया; दैव की गति भी विचित्र है।
उस समय के सामंती समाज की स्थिति इस अंश में मिलती है। साथ ही राजा की निरंकुशता और उसके नियमों का उल्लंघन करने के उपरांत क्या परिणाम होता था, उसका लेखा-जोखा कयमास के कामांध हो जाने पर उसके वध के रूप में मिल जाता है। पृथ्वीराज क्रोध में आकर कयमास का वध कर देता है। चंद को सरस्वती स्वप्न में आकर कयमास वध की पूरी गाथा सुनाती है। वह कहती है -
"इम परउ अयास अवास तइं जिम निसि नसित नषत्रपति।"
अर्थ- कयमास आकाश आवास से इस प्रकार गिरा जैस रात में चंद्रमा नष्ट होकर गिरा हो।
पृथ्वीराज को जब कयमास का स्मरण होता है तो वह पश्चाताप भी करता है। चंद के कहने पर पृथ्वीराज, कयमास की पत्नी को उसका शव सौंप देता है ताकि वह सती हो सके। यंहा पर हमें उस समय की सामाजिक स्थितियों का भी पता चलता है। जब स्त्रियाँ अपने पति की मृत्यु के उपरांत सती हो जाती थीं:-
"अप्पउ कवि कयमास सतीय सच संचरिउ।"
अर्थ-कवि ने कयमास के शव को उसकी स्त्री को अर्पित किया और सती का सत संचरित हुआ।
सामंती व्यवस्था में दासियों की स्थिति सामान्य थी किंतु वह राजा को स्पर्श नहीं कर सकती थीं। इसलिए कयमास वध में जब राजा पृथ्वीराज निद्रा में होता है तब वह दासी उसे बिना स्पर्श किए अपने आने की सूचना कुछ इस प्रकार देती है-
"दीपकु जरई सुमुद्धा नूपुर सद्दानि भानि अच्छानि।"
अर्थ- दीपक जल रहा था, उसी समय उस मुग्धा ने अर्थात दासी ने अपने नुपुर की मधुर ध्वनि से राजा की निद्रा को भंग किया अर्थात अपने आने की सूचना दी।
काव्य की अनुभूति पक्ष का एक गुण रचनाकार की प्रकृति वर्णन संबंधी दृष्टि होती है। प्रकृति मानव के आंतरिक भावों को प्रकट करने के लिए सहचार्य रूप में रही है ।कवि ने कयमास और करनाटी दासी के श्रृंगार भाव को उद्दीप्त करने के लिए प्रकृति का वर्षा काल-जन्य वर्णन किया है। प्रेम की साधना यहां पर मिलती है । वर्षा का समय था और अंधेरा छाया हुआ था। पृथ्वी जल से भीगी हुई थी और तारे जलधारा में छिपे हुए थे-
" अंधारेन जलेन छिन्न क्षितया तारानि धारा रता।"
मनुष्य की प्रवृत्तियों और स्थितियों का ऐसा सुंदर वर्णन कहीं नहीं मिलता । इसी तरह जब पृथ्वीराज आखेट से लौटकर आते हैं तो कवि ने प्रातः कालीन प्रकृति का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है-
"अंबुज विकस बास अलि आयउ ।सांमि वयनि सुंदरी समझायउ।।"
अर्थ- सबेरा होने पर कमलिनी विकसित होने लगी और उसकी सुवास के लिए अलि (भ्रमर) आ गया। स्वामी (अलि)ने वचनों के द्वारा सुंदरी(कमलिनी) को समझाया।
कयमास वध में कवि के वर्णनों में उसका दैव में विश्वास भी प्रकट होता है। पृथ्वीराज चौहान की वीरता भरी और निडर शक्ति संपन्नता की बातों का वर्णन करते हुए चंदबरदाई संकेत करते हैं कि है कयमास का अज्ञान है कि वह पृथ्वीराज चौहान के पूर्व के चरित्र को जानते हुए भी उसे ना जान पाया। ऐसा होने में जो उसका अज्ञान है उसके कारण उस पर आपत्ति आने वाली है अब तो दैव ही उसकी रक्षा कर सकता है-
"अग्यांन चहुआन जांन रहियं दैयोअपि रक्षा करे।"
ऐसा कहने में मनुष्य की विधाता के विधान के सामने परवशता का वर्णन है । विधाता चाहे तो कितनी बड़ी आपत्ति में भी रक्षा कर सकता है, यही संदेश यहां पर दिया गया है। कन्नौज को जाते समय पृथ्वीराज चौहान के मुख से भी कवि ने विधाता और विधि के विधान पर विश्वास व्यक्त किया है। वे कहते हैं-
"सुनि कवि मरनु टरई नवि रंच्यउ।"
अर्थ- हे कवि , सुन विधाता द्वारा रचा हुआ मरना रंच मात्र भी नहीं टलता।
कयमास वध के अंतिम छंद में चंदबरदाई द्वारा भी यह भाव व्यक्त किया गया है कि मृत्यु और विवाह तो विधि के हाथ में होते हैं-
"मरन लग्ग बिधि हथ्थु तथ्थु कबि उच्चरिउ।"
अर्थ- मरण और लगन विधाता के हाथ में होते हैं।
'कयमास वध' अंश में चंद की रसाभिव्यक्ति अत्यंत सटीक है।"वीर और श्रृंगार रसों के पोषण के लिए आवश्यकतानुसार अन्य रसों की भी योजना की गयी है और उनके वर्णन में भी कवि ने उतनी ही तन्मयता दिखलायी है।" नारी दोनों रसों के केंद्र है। पृथ्वीराज ने अपने बाण से कयमास को मार दिया। उनका कयमास पर क्रोध करने के वर्णन में रोद्र रस की अभिव्यक्ति हुई है। उसका वर्णन इस प्रकार है-
"भरिग बान चहुआन जानि दुर देव नाग नर।मुठि्ठ दिठि् रिसि डुलिग चुक्कि निक्करिग एक सर।।"
चहुआन अर्थात पृथ्वीराज का जब बाण चढ़ा तो यह जानकर देव, नाग तथा नर छिप गए। किंतु क्रोध के कारण पृथ्वीराज की मुट्ठी तथा दृष्टि डोल गई और एक बाण चूक कर निकल गया। कयमास वध में शृंगार रस की अभिव्यक्ति भी हुई है।कयमास का करनाटी दासी के प्रति आसक्त होना और वर्षा के होते हुए भी उसके पास चले जाना। श्रृंगार रस ही है । जिसकी अभिव्यक्ति कवि ने कुछ इस इस प्रकार की है -
"राज जा प्रतिमा स चीन धर्मा रामा रमे सा मतीन्।नित्तीरे कर काम वांम वसना संगेन सेज्या गति:।।"
अर्थ-जो राजा की प्रतिमा अर्थात प्रतिनिधि था, वह लघु धर्मा हो गया और उसकी मति रामा यानी कामिनी के प्रति समर्पित हो गई और वह जिसके हाथ में तीर नहीं है, ऐसे कामदेव की वामा यानी कामिनी के वश में होकर वह उसके साथ शय्या - गत हुआ।
शृंगार रस की अभिव्यंजना सरस्वती के के रूप चित्रण में भी मिलती है। कवि ने हंस पर बैठी हुई , वीणा हाथ में लिए हुए , सरस्वति का जो वर्णन किया है । उसमें शृंगार रस है-
"सबद्द बद्द नुप्पुरे।
चलंति हंस अंकुरे।
सु भाय पाय रंगु जा।
सु अध्ध रत्त अंबुजा।।
अर्थ- जिसके नूपुर शब्द कर रहे थे,मानो मराल-शावक चल रहे हों और जिसके पैर स्वाभाविक रीति से ऐसे रंजित थे मानो उनके नीचे रक्त अर्थात लाल कमल हों।
भाषा भाव व संवेदना को आकार देती है। 'पृथ्वीराज रासो' की भाषा के संबंध में भी विवाद रहा है। वस्तुतः यह काव्य पिंगल शैली में लिखा गया है,जो ब्रजभाषा का वह रूप है जिसमें राजस्थानी बोलियों का मिश्रण मिलता है। कवि ने तत्कालीन सभी प्रचलित शब्दों का स्वतंत्रता से प्रयोग किया है।शब्दचयन रसानुकूल हैं । लाक्षणिक तथा ध्वन्यात्मक शब्दावली ने भी प्राय: भाषा सौंदर्य की वृद्धि की है। शब्दों के अर्थ को बिम्बित करने का कार्य शिल्प करता है।वीरगाथा काल में वीरों के वर्णन में अतिश्योक्ति तो प्रायः सभी जगह मिलती है।अन्य अलंकारों का प्रयोग भी दृष्टव्य है-
अनुप्रास- नवति नवप्पल निसि गलित।उत्प्रेक्षा- मनहु नागपति पतिनि अप्प जगातियउ।
घप्पय छंद में चंद का विशेष योगदान है।विद्वानों ने चंद को छप्पियों का राजा कहा है।
निष्कर्षत: कयमास वध मं तत्कालीन समाज की धार्मिकता , राजनीति,सामाजिक विश्वास , राजा की निरंकुशता के साथ उसका पश्चाताप , सती प्रथा और भी कघ मंतव्य अंतर्निहित हैं। साथ ही पृथ्वीराज द्वारा उसके शूर सामंत कयमास का वध किया जाना भी वर्णित है।
आधार ग्रंथ:-
कयमास वध- [चंदबरदाई कृत 'पृथ्वीराज रसो' का तृतीय सर्ग]- सम्पादक- माताप्रसाद गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण: 2017।
संदर्भ-ग्रंथ:-
- हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचंद्र शुक्ल, लोकभारती प्रकाशन ,प्रथम संस्करण- 2002,पृष्ठ 30।
- हिंदी साहित्य का इतिहास- सं०- डॉ नगेंद्र ,सह सं० डॉ० हरदयाल, प्रथम संस्करण- 1973, मयूर पेपर बैक्स, पृष्ठ संख्या -70।
- पृथ्वीराज रासो का कैमास वध- श्रीनिवास शर्मा, प्रकाशक- ईशा ज्ञानदीप,प्रथम संस्करण- 2001।
- कयमास-वध(चंदवरदाई कृत'पृथ्वीराज रासउ'का तृतीय सर्ग), संपादक-माताप्रसाद गुप्त

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