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मानव संसाधन विकास का अर्थ तथा उसके साधन Manav sansadhan Vikas ka Arth

मानव संसाधन विकास का अर्थ तथा उसके साधन
मानव संसाधन विकास का अर्थ तथा उसके साधन 


  • १. मानव संसाधन विकास का अर्थ 
  • २. मानव संसाधन विकास के साधन 

इस लेख को पढ़ने के बाद आप निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर देने हेतु सक्षम हो सकेंगे ।

  • मानव संसाधन विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिए मानव संसाधन विकास के साधनों का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।

  • मानव संसाधन विकास से आप क्या समझते हैं संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।  

  • मानव संसाधन विकास की संकल्पना क्या है ?

मानव संसाधन विकास का अर्थ (Meaning of human resource development)

"ज्ञान ज्ञान के लिए है" या "शिक्षा शिक्षा के लिए है" का नारा सर्वमान्य सिद्धांत बना हुआ था। बालक के चारित्रिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षा देने की परंपरा शिक्षा को अनउत्पादक क्रिया माना जाने लगा था। जब शिक्षा का प्रसार हुआ, नामांकन संख्या बढ़ने लगी, व्यय में वृद्धि होने लगी और राज्य को शिक्षा पर अधिक धन खर्च करना पड़ा तो शिक्षा शास्त्रियों का ध्यान शिक्षा के आर्थिक पक्ष की ओर गया।  
अर्थशास्त्र की वर्तमान धारणा में मनुष्य की उन क्रियाओं के अध्ययन को प्रमुखता दी गई है जिसका संबंध धन से हो। इसमें मानव की धन संबंधी सामाजिक क्रियाओं की प्रधानता है। मनुष्य समाज में रहता है और समाज में रहने के कारण उसकी अनेक आर्थिक समस्याएं होती हैं। आर्थिक समस्याओं का विश्लेषण अर्थशास्त्र में होता है।  
डॉक्टर सीगर के अनुसार 
  • "अर्थशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जिसमें मानवीय प्रयासों के उस अंग की विवेचना होती है जिसका संबंध जीविकोपार्जन से होता है" 
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्शल के अनुसार 
  • "अर्थशास्त्र मनुष्य के साधारण जीवन में व्यापार संबंधों का अध्ययन करता है। यह इस बात का पता लगाता है कि वह किस प्रकार धन का उपार्जन करता है तथा उसका उपयोग करता है। अर्थशास्त्र जहाँ एक ओर धन का अध्ययन करता है तो दूसरी ओर इससे भी अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का अध्ययन करता है" 
प्रोफेसर जे के मेहता के अनुसार, 
  • "अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो मानव व्यवहार का अध्ययन करता है जो आवश्यकता विहीनता की दशा की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं" 
अब अर्थशास्त्र का क्षेत्र विस्तृत हो गया। अब इसे केवल धन का शास्त्र न मानकर मनुष्य तथा मानव कल्याण से सम्बंधित शास्त्र माना जाता है। इस दृष्टि से उसका संबंध शिक्षाशास्त्र से भी होता हो जाता है। शिक्षा शास्त्र में बालक के कल्याण का ध्यान रखा जाता है। इसमें व्यक्ति व समाज के नैतिक आदर्शों की विवेचना होती है। 
इसमें समाज कल्याण व व्यक्ति कल्याण की कल्पना का मूर्त रूप दिखाई देता है। शिक्षा शास्त्र का यह कार्य विद्यालयों की स्थापना, शिक्षकों की नियुक्ति, भवन निर्माण, खेल व्यवस्था, परीक्षा व्यवस्था एवं अन्य शैक्षिक कार्यकलापों द्वारा संपन्न होता है। इस कार्य में धन की आवश्यकता होती है। 
धन की व्यवस्था व प्रबंधन में अर्थशास्त्र से सहायता मिलती है। आजकल शिक्षा के अर्थशास्त्र का विकास हो रहा है। आर्थिक परिस्थितियों का शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है और शिक्षा के प्रतिफल का शिक्षा की योजना बनाने में प्रभाव पड़ता है। 



अमेरिका में शिक्षा का विशेष रूप से विकास हुआ है। अमेरिकी अर्थशास्त्रियों ने इस क्षेत्र में विशेष कार्य किया है।प्रसिद्द अमरीकी अर्थशास्त्री थ्योडर शूल्ज ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किया। रूस ने भी इस दिशा में सराहनीय कार्य किया है इसमें एस.जी. स्टूमिलिन का योगदान महत्वपूर्ण है। इंग्लॅण्ड में जॉन वेजी और फ़्रांस में माइकेल डेवनेश आदि विद्वानों ने इस शाखा का विकास किया। 
एडम स्मिथ ने स्थिति पूँजी में समाज की सदस्यों के लाभदायक योग्यताओं को सम्मिलित करके और थोमस आर माल्थस ने सामाजिक सामंजस्य और आर्थिक शांति के लिए श्रमिकों की शिक्षा और साक्षरता पर देकर शैक्षिक अर्थशास्त्र के विकास के लिए उर्वर भूमि तैयार कर दी थी।
अल्फ्रेड मार्शल ने कहा था 
  • "सबसे अधिक मूल्यवान पूंजी वह है जिसका विनियोग मनुष्य पर किया जाता है" 
कार्ल मार्क्स ने श्रमिक के तकनीकी कौशल को बढ़ाने पर बल दिया था। मार्शल ने शिक्षा को व्यवसाय पक्ष पर बल दिया था और शिक्षा को आर्थिक विकास से जोड़ने का समर्थन किया था।  


मानव संसाधन विकास के साधन 

(Sources of human resource development) 

१. प्रौढ़ शिक्षा (Adult education)

  • वयस्क शिक्षा की आर्थिक विकास के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता है हमारे देश में 63% व्यक्ति निरक्षर हैं।भारत का विकास इन्हीं निरक्षर व्यक्तियों पर निर्भर करता है। इसलिए साक्षरता एवं समाज शिक्षा सघन प्रयत्नों द्वारा उन्हें इस योग्य बनाना होगा कि वे कृषि तथा उद्योग धंधों से संबंधित साहित्य को समझ सकें और उसके आधार पर कृषि तथा व्यवसाय में प्रगति कर सकें। शिक्षा से तकनीकी ज्ञान, विवेक एवं साहस में वृद्धि होती है जिससे आर्थिक क्रियाओं का विस्तार होता है, साधनों का सही से उपयोग संभव बनता है तथा उत्पादन बढ़ता है जिससे आर्थिक प्रगति होती है। 

२. प्राथमिक शिक्षा (Primary education) 

  • प्राथमिक शिक्षा से शिक्षा का आधार तैयार होता है। इससे साक्षरता आती है, प्रारंभिक कुशलता मिलती है और उचित मनोवृति निर्मित होती है। अपने आसपास के पर्यावरण की जानकारी प्राप्त कर लेने से वे अंधविश्वास और अविवेक के चक्कर में नहीं फसते जिससे उनके विकासात्मक प्रयासों में अवरोध नहीं आ पाता। नई तकनीकी पद्धतियों, कार्य अनुभव और यंत्रों के प्रयोग के प्रति उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न होता है जो उनका आधुनिक युग की उत्पादन क्रियाओं से समायोजन करने में सहायक होता है। इस शिक्षा काल में उनकी मनोवृत्तियां भी परिष्कृत होती हैं। उनमें सहानुभूति, भ्रातृत्व, सहिष्णुता, मानवता, सहकारिता आदि की भावना उत्पन्न करते हैं जो उन्हें राष्ट्र समाज तथा कार्यशाला का उपयोगी सदस्य बनाने में सहायक होती है। 

३. माध्यमिक शिक्षा (Secondary Education)

  • माध्यमिक शिक्षा अधिकांश छात्रों के लिए अंतिम शिक्षा स्तर होता है जिसके बाद वे किसी आर्थिक क्रिया में संलग्न हो जाते हैं। यह क्रिया या तो उनका स्वयं का कोई रोजगार धंधा हो या मध्यम वर्ग के कर्मचारी की हैसियत से किसी कार्यालय या कारखाना में कार्य करें। वे खेती, दस्तकारी शिल्प कर्म करते हैं अथवा लिपिक, यांत्रिक या श्रमिक के रूप में नौकरी करते हैं। चाहे वे सीधे उत्पादन के कारखानों में काम करें अथवा प्रशासन संगठन आदि कार्यालयों में रहे, आर्थिक विकास में सहायक होते हैं। माध्यमिक शिक्षा सबसे अधिक संख्या में निपुण अथवा अर्द्धनिपुणों का निर्माण करती है। माध्यमिक शिक्षा उतरीं कर छात्र उच्च शिक्षा में प्रवेश पाते हैं। इस प्रकार माध्यमिक शिक्षा की आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है 

४. उच्च शिक्षा (Higher education)

शिक्षा उच्च वर्ग के कर्मचारियों का निर्माण करती है। ये बड़े-बड़े कारखानों चलाते हैं। इनके विवेकपूर्ण निर्णय एवं संचालन पर ही उत्पादन प्रगति निर्भर है। उच्च शिक्षा दो प्रकार की होती है:- 

१. सामान्य 

२. विशिष्ट। 

  • सामान्य शिक्षा से प्रशासन एवं संगठन के लिए लोग प्राप्त होते है जबकि विशेष शिक्षा से यांत्रिकी एवं कर्मचारी प्राप्त होते हैं। आर्थिक विकास के लिए पप्रायः विशिष्ट प्रकार के शिक्षण पर बल दिया जाता है किंतु विशेष शिक्षण के कारण व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। विज्ञान और तकनीकी प्रगति के कारण प्राविधियों में शीघ्रता से परिवर्तन होता है। इसलिए व्यक्तियों की आवश्यकता बढ़ती जाती है जो परिवर्तित परिस्तिथियों से शीघ्र समायोजन कर लेती है। 


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