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लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत (Lawrence Kohlberg's Theory of Moral Development)

लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत 

(Lawrence Kohlberg's Theory of Moral Development)


लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास की अवस्था का सिद्धांत Naitik Vikas ki awastha Ka siddhant

लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास की अवस्था का सिद्धांत 

प्रस्तावना (Introduction)

  • ​बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) और विकासात्मक मनोविज्ञान (Developmental Psychology) के क्षेत्र में जब भी मनुष्य के चरित्र और उसकी नैतिकता के विकास की बात आती है, तो सबसे प्रामाणिक और विस्तृत नाम लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) का आता है। कोहलबर्ग एक प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस बात पर शोध करने में लगा दिया कि इंसान यह कैसे तय करता है कि क्या सही है और क्या गलत।

  • ​जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत से अत्यधिक प्रभावित होकर, कोहलबर्ग ने बच्चों के 'नैतिक निर्णयों' (Moral Judgments) के पीछे छिपे मानसिक तर्कों को समझने का प्रयास किया। उनका यह मानना था कि जैसे-जैसे बच्चे का संज्ञानात्मक या बौद्धिक विकास होता है, वैसे-वैसे उसकी नैतिकता (Morality) का भी विकास होता है। कोहलबर्ग का यह नैतिक विकास की अवस्था का सिद्धांत (Theory of Moral Development) हमें बताता है कि नैतिकता जन्मजात नहीं होती, बल्कि आयु और परिपक्वता (Maturity) के साथ विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए विकसित होती है।


सिद्धांत की मूलभूत अवधारणाएँ 

(Basic Concepts of the Theory)

​कोहलबर्ग के सिद्धांत की गहराई में जाने से पहले उन तकनीकी शब्दों और अवधारणाओं को समझना आवश्यक है, जिन पर यह पूरा सिद्धांत टिका हुआ है।

1. नैतिकता (Morality)

नैतिकता वह गुण है जिसके द्वारा हम सही (Right) और गलत (Wrong) के बीच अंतर कर पाते हैं। जन्म के समय एक शिशु न तो नैतिक (Moral) होता है और न ही अनैतिक (Immoral)। वह अपनी सहज प्रवृत्तियों (Instincts) से संचालित होता है। सामाजिक परिवेश (Social Environment) और परिपक्वता के साथ उसमें नैतिकता का जन्म होता है।

2. नैतिक दुविधा (Moral Dilemma)

कोहलबर्ग का संपूर्ण सिद्धांत नैतिक दुविधा (Moral Dilemma) पर आधारित है। नैतिक दुविधा वह स्थिति है जब हमारे सामने दो ऐसे विकल्प होते हैं, जिनमें से किसी एक को चुनना बेहद कठिन होता है, क्योंकि दोनों ही विकल्पों में कुछ न कुछ सही और कुछ न कुछ गलत छिपा होता है। सरल शब्दों में, "धर्मसंकट की स्थिति" को नैतिक दुविधा कहा जाता है। कोहलबर्ग बच्चों को ऐसी ही कहानियाँ सुनाते थे और फिर उनसे प्रश्न पूछते थे।

3. नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning)

सही या गलत का निर्णय लेने के लिए हम अपने मस्तिष्क में जो चिंतन या तर्क (Logic) करते हैं, उसे नैतिक तर्कणा (Moral Reasoning) कहा जाता है। कोहलबर्ग के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं था कि बच्चे ने क्या निर्णय लिया (हाँ या ना), बल्कि उनके लिए यह महत्वपूर्ण था कि बच्चे ने वह निर्णय किस तर्क के आधार पर लिया।

हेंज की दुविधा 

(The Heinz Dilemma)

​कोहलबर्ग ने अपने शोध के दौरान बच्चों को कई कहानियाँ सुनाईं, लेकिन उनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी "हेंज की दुविधा" (Heinz Dilemma) है। इस सिद्धांत को समझने के लिए इस कहानी को समझना अत्यंत आवश्यक है:

यूरोप में 'हेंज' (Heinz) नाम का एक व्यक्ति था, जिसकी पत्नी एक विशेष प्रकार के कैंसर से पीड़ित थी और मृत्यु के कगार पर थी। डॉक्टरों ने बताया कि शहर के ही एक फार्मासिस्ट (दवा विक्रेता) ने हाल ही में रेडियम से बनी एक ऐसी दवा खोजी है, जिससे उसकी पत्नी की जान बच सकती है। हेंज उस फार्मासिस्ट के पास गया। फार्मासिस्ट ने उस दवा को बनाने में जितने पैसे खर्च किए थे, वह उसका दस गुना दाम मांग रहा था (दवा बनाने का खर्च $200 था, लेकिन वह $2000 मांग रहा था)।


हेंज ने अपने सभी जानकारों से पैसे उधार मांगे, फिर भी वह केवल $1000 ही जुटा पाया। उसने फार्मासिस्ट से मिन्नतें कीं कि उसकी पत्नी मरने वाली है, इसलिए या तो वह दवा सस्ती दे दे या बाकी पैसे बाद में लेने को तैयार हो जाए। लेकिन फार्मासिस्ट ने साफ मना कर दिया और कहा, "मैंने यह दवा खोजी है और मैं इससे पैसा कमाऊंगा।" निराश होकर, हेंज ने रात में फार्मासिस्ट की दुकान का ताला तोड़ा और अपनी पत्नी के लिए वह दवा चुरा ली।

​इस कहानी को सुनाने के बाद कोहलबर्ग बच्चों से प्रश्न पूछते थे:

  • क्या हेंज को दवा चुरानी चाहिए थी?
  • क्या चोरी करना सही है या गलत? और क्यों?
  • यदि वह महिला हेंज की पत्नी न होकर कोई अजनबी होती, तो क्या तब भी हेंज को दवा चुरानी चाहिए थी?
  • क्या पुलिस को उस फार्मासिस्ट को गिरफ्तार करना चाहिए?

​बच्चों द्वारा दिए गए तर्कों (Reasoning) के आधार पर कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन मुख्य स्तरों (3 Levels) और छह अवस्थाओं (6 Stages) में विभाजित किया।

नैतिक विकास के स्तर और अवस्थाएँ 

(Levels and Stages of Moral Development)

​कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन क्रमिक स्तरों में बाँटा है और प्रत्येक स्तर के अंतर्गत दो अवस्थाएँ बताई हैं। ये अवस्थाएँ एक निश्चित क्रम (Sequential Order) में आगे बढ़ती हैं।

स्तर 1: पूर्व-लौकिक या पूर्व-परम्परागत स्तर (Pre-Conventional Level)

​यह स्तर सामान्यतः 4 से 10 वर्ष तक के बच्चों में देखा जाता है। इस स्तर पर बच्चे के अंदर अपनी खुद की कोई नैतिकता नहीं होती। सही और गलत का निर्णय बाहरी कारकों (External Factors) जैसे—बड़ों के नियम, दंड का डर या खुद के फायदे द्वारा तय होता है। इस स्तर की दो अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं:

अवस्था 1: आज्ञा एवं दंड की अवस्था (Obedience and Punishment Orientation)

इस अवस्था में बच्चे की नैतिकता पूरी तरह से 'दंड के भय' से संचालित होती है। बच्चे का मानना होता है कि नियम बड़ों द्वारा बनाए गए हैं और अगर नियमों को तोड़ा गया तो सजा मिलेगी। जिस काम के लिए सजा मिलती है, वह गलत है; और जिससे सजा नहीं मिलती, वह सही है।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का बच्चा कहेगा, "हेंज को दवा नहीं चुरानी चाहिए थी, क्योंकि अगर वह चोरी करेगा तो पुलिस उसे पकड़ लेगी और जेल में डाल देगी।" (यहाँ तर्क चोरी के अनैतिक होने पर नहीं, बल्कि दंड के डर पर आधारित है)।

अवस्था 2: अहंकार की अवस्था या साधनात्मक सापेक्षवादी अभिमुखता (Individualism and Exchange / Instrumental Relativist Orientation)

इसे "टिट फॉर टैट" (Tit for Tat) या "जैसे को तैसा" की अवस्था भी कहा जाता है। अब बच्चा यह समझने लगता है कि केवल बड़ों के नियम ही सब कुछ नहीं हैं। हर व्यक्ति का अपना एक अलग नजरिया और हित हो सकता है। इस अवस्था में बच्चा उसी कार्य को सही मानता है जिसमें उसका खुद का कोई फायदा (Self-interest) हो या जिससे उसकी कोई आवश्यकता पूरी होती हो।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का बच्चा कहेगा, "हेंज का दवा चुराना सही था, क्योंकि अगर वह अपनी पत्नी को बचा लेगा, तो पत्नी बाद में उसके लिए खाना बनाएगी और उसका ध्यान रखेगी।" या वह यह भी कह सकता है, "फार्मासिस्ट बहुत लालची था, इसलिए हेंज ने उसके साथ सही किया।" (यहाँ नैतिकता आपसी लेनदेन और व्यक्तिगत लाभ पर आधारित है)।

स्तर 2: लौकिक या परम्परागत स्तर (Conventional Level)

​यह स्तर सामान्यतः 10 से 13 वर्ष की आयु (किशोरावस्था की शुरुआत) में देखा जाता है। इस स्तर पर बच्चा समाज, परिवार और देश के नियमों को अपना लेता है (Internalize कर लेता है)। वह समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहता है। यहाँ नैतिकता सामाजिक नियमों और अपेक्षाओं से निर्धारित होती है।

​इस स्तर की दो अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं:

अवस्था 3: अच्छा लड़का-अच्छी लड़की की अवस्था (Good Interpersonal Relationships / Good Boy-Good Girl Orientation)

इस अवस्था में बच्चा वह व्यवहार करता है जिससे दूसरे लोग उसे पसंद करें, उसकी तारीफ करें और उसे स्वीकृति (Approval) मिल सके। आपसी रिश्ते और विश्वास नैतिकता का आधार बन जाते हैं। बच्चा "अच्छा" दिखना चाहता है।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का किशोर कहेगा, "हेंज को दवा चुरानी चाहिए थी, क्योंकि एक 'अच्छे पति' का फर्ज है कि वह अपनी पत्नी की जान बचाए। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो लोग उसे एक बुरा इंसान कहते।" (यहाँ तर्क सामाजिक स्वीकृति और रिश्तों को निभाने पर आधारित है)।

अवस्था 4: सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की अवस्था (Maintaining the Social Order / Law and Order Orientation)

अब बच्चे का दायरा केवल अपने परिवार या दोस्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे समाज के परिप्रेक्ष्य (Broader Perspective) में सोचने लगता है। उसका मानना होता है कि समाज को सही ढंग से चलाने के लिए कानून और नियम अत्यंत आवश्यक हैं। नियम परम सत्य (Absolute) हैं और किसी भी परिस्थिति में कानून नहीं तोड़ा जाना चाहिए।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का व्यक्ति कहेगा, "हालाँकि हेंज की पत्नी की जान खतरे में थी, लेकिन फिर भी चोरी करना कानून के खिलाफ है। हेंज को चोरी नहीं करनी चाहिए थी। यदि हर व्यक्ति मुसीबत पड़ने पर कानून तोड़ने लगेगा, तो समाज में अराजकता (Chaos) फैल जाएगी।" (यहाँ तर्क कानून और सामाजिक व्यवस्था के सम्मान पर आधारित है)।

स्तर 3: उत्तर-लौकिक या उत्तर-परम्परागत स्तर (Post-Conventional Level)

​यह कोहलबर्ग के सिद्धांत का सर्वोच्च स्तर है, जो 13 वर्ष की आयु के बाद शुरू होता है। कोहलबर्ग का मानना था कि अधिकांश लोग कभी भी इस स्तर तक नहीं पहुँच पाते। इस स्तर पर व्यक्ति समाज के नियमों से परे जाकर, सार्वभौमिक (Universal) और अमूर्त नैतिक सिद्धांतों (Abstract Moral Principles) के आधार पर तर्क करता है। अब नैतिकता पूरी तरह से आंतरिक (Internal) हो जाती है।

​इस स्तर की दो अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं:

अवस्था 5: सामाजिक अनुबंध एवं व्यक्तिगत अधिकार (Social Contract and Individual Rights)

इस अवस्था में व्यक्ति यह समझ जाता है कि कानून और नियम समाज की भलाई के लिए बनाए गए हैं, न कि इंसान कानूनों के लिए बना है। यदि कोई कानून किसी व्यक्ति के मूल अधिकारों (Fundamental Rights) का हनन करता है या बहुसंख्यक लोगों के लिए नुकसानदायक है, तो लोकतांत्रिक तरीके से उस कानून को बदला जा सकता है। नियम कठोर नहीं, बल्कि लचीले (Flexible) माने जाते हैं।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का व्यक्ति कहेगा, "कानून चोरी करने से रोकता है, लेकिन मानव जीवन का अधिकार (Right to Life) संपत्ति के अधिकार (Property Rights) से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए, हेंज का चोरी करना नैतिक रूप से सही था। कानून को मानव जीवन की रक्षा के लिए लचीला होना चाहिए।"

अवस्था 6: सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (Universal Ethical Principles)

यह नैतिकता की चरम सीमा है। यहाँ व्यक्ति अपनी अंतरात्मा (Conscience) की आवाज़ सुनता है। वह उन सार्वभौमिक सिद्धांतों (जैसे—न्याय, समानता, मानवाधिकार, और मानव जीवन का सम्मान) का पालन करता है जो संपूर्ण मानवता के लिए सही हैं। इन सिद्धांतों के लिए वह समाज, कानून और यहाँ तक कि अपनी जान की भी परवाह नहीं करता (जैसे—महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, भगत सिंह)।

  • हेंज की दुविधा पर तर्क: इस अवस्था का व्यक्ति कहेगा, "मानव जीवन को बचाना सर्वोच्च कर्तव्य है। यह मायने नहीं रखता कि वह महिला हेंज की पत्नी है या कोई अजनबी। मानव जीवन की कीमत किसी भी दवाई या कानून से बढ़कर है। इसलिए हेंज ने जो किया वह पूर्णतः सत्य है, और इसके लिए यदि उसे जेल भी जाना पड़े, तो उसे वह दंड स्वीकार कर लेना चाहिए।"

शिक्षा में कोहलबर्ग के सिद्धांत का उपयोग 

(Educational Implications)

​शिक्षकों और माता-पिता के लिए यह सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके कुछ प्रमुख शैक्षिक निहितार्थ इस प्रकार हैं:

  • तार्किक क्षमता का विकास: शिक्षकों को चाहिए कि वे कक्षाओं में बच्चों के सामने वास्तविक जीवन की नैतिक दुविधाएँ (Moral Dilemmas) प्रस्तुत करें और उन पर चर्चा (Group Discussion) करवाएं। इससे बच्चों में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) विकसित होता है।
  • आयु के अनुसार अपेक्षाएँ: यह सिद्धांत शिक्षकों को यह समझने में मदद करता है कि एक 6 साल के बच्चे और 14 साल के किशोर की नैतिकता अलग-अलग होती है। अतः छोटे बच्चों से उच्च स्तरीय नैतिक तर्कों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
  • दंड-मुक्ति का माहौल: बच्चों को केवल 'दंड के डर' (अवस्था 1) तक सीमित रखने के बजाय, शिक्षकों को उन्हें नियमों के पीछे के कारण समझाने चाहिए ताकि वे 'सामाजिक व्यवस्था' (अवस्था 4) और 'सार्वभौमिक सिद्धांतों' (अवस्था 6) की ओर बढ़ सकें।

कोहलबर्ग के सिद्धांत की आलोचना 

(Criticism of Kohlberg's Theory)

​यद्यपि कोहलबर्ग का सिद्धांत बेहद प्रभावशाली है, लेकिन कई मनोवैज्ञानिकों ने इसमें गंभीर कमियां निकाली हैं। इसकी मुख्य आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं:

1. कैरोल गिलिगन (Carol Gilligan) द्वारा लिंग पूर्वाग्रह (Gender Bias) का आरोप:

कैरोल गिलिगन, जो स्वयं कोहलबर्ग की शिष्या थीं, ने इस सिद्धांत की सबसे कड़ी आलोचना की। गिलिगन का तर्क था कि कोहलबर्ग ने अपने शोध में केवल पुरुषों और लड़कों (Male subjects) को ही शामिल किया था, इसलिए उनका सिद्धांत स्त्रियों की नैतिकता को सही ढंग से नहीं मापता।

  • गिलिगन के अनुसार, पुरुषों की नैतिकता "न्याय की नैतिकता" (Morality of Justice) पर आधारित होती है, जहाँ वे नियमों और अधिकारों पर जोर देते हैं। जबकि महिलाओं की नैतिकता "देखभाल की नैतिकता" (Morality of Care) पर आधारित होती है, जहाँ वे मानवीय रिश्तों, करुणा और सहानुभूति पर जोर देती हैं। कोहलबर्ग ने महिलाओं के इस देखभाल वाले दृष्टिकोण को निचले स्तर (अवस्था 3) पर रख दिया, जो कि गिलिगन के अनुसार एक बड़ा लैंगिक पूर्वाग्रह (Gender Bias) है।

2. सांस्कृतिक पूर्वाग्रह (Cultural Bias):

  • कोहलबर्ग का सिद्धांत पश्चिमी देशों (व्यक्तिवादी संस्कृतियों / Individualistic Cultures) पर आधारित है। भारत या चीन जैसी सामूहिकतावादी संस्कृतियों (Collectivistic Cultures) में, जहाँ परिवार और समाज को व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है, नैतिकता के पैमाने भिन्न हो सकते हैं। कोहलबर्ग ने इस सांस्कृतिक भिन्नता को अनदेखा कर दिया।

3. तर्क और व्यवहार में अंतर (Difference between Reasoning and Behavior):

  • आलोचकों का कहना है कि व्यक्ति जो 'तर्क' देता है और वास्तविक जीवन में जो 'व्यवहार' करता है, उसमें बहुत अंतर होता है। यह जरूरी नहीं है कि जो व्यक्ति नैतिक रूप से बड़ी-बड़ी बातें करता है (उच्च तर्कणा), वह वास्तविक जीवन में मुसीबत पड़ने पर वैसा ही नैतिक व्यवहार भी करे। कोहलबर्ग ने केवल बच्चों के कथनों को मापा, उनके वास्तविक आचरण को नहीं।

4. काल्पनिक परिस्थितियाँ (Hypothetical Situations):

  • कोहलबर्ग ने बच्चों से जो प्रश्न पूछे वे पूरी तरह से काल्पनिक (Hypothetical) थे। एक 10 साल के बच्चे के लिए यह कल्पना करना बहुत कठिन है कि कैंसर से पीड़ित पत्नी को बचाने के लिए चोरी करना कैसा अनुभव होता है। वास्तविक जीवन की दुविधाओं में इंसान का निर्णय अक्सर सिद्धांतों से अलग भावनाओं पर आधारित होता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

​आलोचनाओं के बावजूद, लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। यह हमें यह समझने का एक शानदार और क्रमबद्ध ढांचा प्रदान करता है कि एक बच्चा बाहरी नियंत्रण (दंड और पुरस्कार) से शुरू होकर किस प्रकार अपनी आंतरिक अंतरात्मा (Conscience) तक की यात्रा तय करता है। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों के लिए यह समझना अति आवश्यक है कि नैतिकता रटाने या उपदेश देने से नहीं आती, बल्कि बौद्धिक परिपक्वता और सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction) के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित होती है। कोहलबर्ग ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर किया कि नैतिकता सिर्फ नियम मानने में नहीं है, बल्कि यह जानने में है कि "वे नियम क्यों माने जाएं।"


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