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शिक्षण व्यूह रचना अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एवं आधुनिक शिक्षा में इसका व्यापक स्वरूप

                       

   "शिक्षण व्यूह रचना" अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एवं आधुनिक शिक्षा में  व्यापक स्वरूप

  • ​शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण एक अत्यंत जटिल, सोद्देश्यपूर्ण और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। एक समय था जब शिक्षण को केवल ज्ञान के हस्तांतरण (Transfer of knowledge) तक सीमित माना जाता था। परंतु, आधुनिक शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षण केवल सूचनाएं देना नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थी के व्यवहार में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन लाने की एक वैज्ञानिक कला है। 

  • इसी पूर्व-नियोजित, वैज्ञानिक और व्यवस्थित योजना को शिक्षा जगत में "शिक्षण व्यूह रचना" (Teaching Strategy) का नाम दिया गया है। इस आलेख में हम शिक्षण व्यूह रचना के शाब्दिक अर्थ, इसकी उत्पत्ति, प्रमुख शिक्षाविदों द्वारा दी गई परिभाषाओं, इसकी विशेषताओं और शिक्षण विधियों से इसके अंतर पर अत्यंत सूक्ष्म और गहन चर्चा करेंगे। 

'व्यूह रचना' (Strategy) शब्द की उत्पत्ति और शाब्दिक अर्थ

  • "व्यूह रचना" मूल रूप से सैन्य विज्ञान (Military Science) का शब्द है। अंग्रेजी भाषा के शब्द "Strategy" (स्ट्रेटेजी) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द "Strategia" (स्ट्रेटेजिया) से हुई है, जिसका अर्थ होता है— 'सेनापति की कला' (Art of the General)।

  • ​प्राचीन काल में युद्ध के मैदान में सेनापति अपने शत्रुओं को परास्त करने और युद्ध जीतने के लिए अपनी सेना को एक विशेष क्रम और योजना के तहत खड़ा करता था। इस विशेष जमावट और चाल को ही "व्यूह रचना" कहा जाता था। महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य द्वारा रचित "चक्रव्यूह" इसका एक उत्कृष्ट ऐतिहासिक उदाहरण है।

शिक्षा के क्षेत्र में इसका प्रवेश:

  • बीसवीं शताब्दी के मध्य में, शिक्षाविदों ने यह महसूस किया कि कक्षा का वातावरण भी किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं है। यहाँ शिक्षक एक सेनापति (Commander) के समान है, अज्ञानता, अनुशासनहीनता और भ्रांतियां उसके शत्रु हैं, और उसका अंतिम लक्ष्य है— शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Objectives) की प्राप्ति।
  • ​अतः, अज्ञानता पर विजय प्राप्त करने और विद्यार्थियों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने के लिए शिक्षक द्वारा कक्षा में जो विशिष्ट योजनाएं, तरकीबें और नीतियां अपनाई जाती हैं, उन्हें ही "शिक्षण व्यूह रचना" कहा जाने लगा।

शिक्षण व्यूह रचना का मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक अर्थ

​शैक्षिक दृष्टिकोण से, शिक्षण व्यूह रचना का अर्थ उस व्यापक कार्य-योजना (Comprehensive action plan) से है, जिसका निर्माण शिक्षक द्वारा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया (Teaching-Learning Process) को प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है।

​यह कोई एक सामान्य 'विधि' नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण 'तंत्र' (System) है। इसके अंतर्गत शिक्षक यह निर्धारित करता है कि:

  • ​छात्रों का पूर्व-ज्ञान (Entry behavior) क्या है?
  • ​पाठ्यवस्तु (Subject matter) की प्रकृति कैसी है?
  • ​किन शिक्षण सहायक सामग्रियों (Teaching aids) का प्रयोग किया जाएगा?
  • ​कक्षा का वातावरण कैसा रखा जाएगा?
  • ​मूल्यांकन (Evaluation) किस प्रकार किया जाएगा?

​सरल शब्दों में कहें तो, "शिक्षण व्यूह रचना एक ऐसी पूर्व-निर्धारित और लचीली योजना है, जो ज्ञानात्मक (Cognitive), भावात्मक (Affective) और मनोगत्यात्मक (Psychomotor) उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षक और छात्र के बीच एक सार्थक अंतःक्रिया (Interaction) स्थापित करती है।"

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई शिक्षण व्यूह रचना की परिभाषाएं

​इस अवधारणा को और अधिक गहराई से समझने के लिए, शिक्षाशास्त्र और शैक्षिक तकनीकी के विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने शोध के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना को परिभाषित किया है। प्रमुख परिभाषाएं इस प्रकार हैं:

1. ई. स्टोंस एवं एस. मॉरिस (E. Stones and S. Morris) के अनुसार:

"शिक्षण व्यूह रचना, शिक्षण की एक ऐसी व्यापक विधि है, जिसमें उन सभी शैक्षिक परिस्थितियों का समावेश होता है जो किसी विशिष्ट शैक्षिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक होती हैं।"


​इस परिभाषा में 'व्यापकता' पर बल दिया गया है। स्टोंस और मॉरिस यह स्पष्ट करते हैं कि व्यूह रचना कोई छोटी या सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें कक्षा की पूरी परिस्थिति (वातावरण, छात्र की मनोदशा, शिक्षक का व्यवहार) समाहित होती है।

2. आई. के. डेवीज (I. K. Davies) के अनुसार:

"शिक्षण व्यूह रचनाएं, शिक्षण की वे विस्तृत योजनाएं हैं जिनमें शिक्षण के उद्देश्यों, विद्यार्थियों के व्यवहार परिवर्तन, पाठ्यवस्तु के प्रस्तुतीकरण और मूल्यांकन को एक ही शृंखला में पिरोया जाता है।"


​डेवीज की यह परिभाषा सबसे अधिक वैज्ञानिक मानी जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यूह रचना में उद्देश्य, प्रस्तुतीकरण और मूल्यांकन— तीनों एक ही धागे में बंधे होते हैं। यदि इनमें से एक भी तत्व कमजोर पड़ा, तो व्यूह रचना विफल हो जाती है।

3. बी. ओ. स्मिथ (B. O. Smith) के अनुसार:

"व्यूह रचना का तात्पर्य शिक्षक के उन सभी कार्यों की रूपरेखा से है, जिन्हें वह छात्रों के समक्ष किसी पाठ्यवस्तु को प्रस्तुत करने और उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करने हेतु अपनाता है।"


​स्मिथ ने 'प्रेरणा' (Motivation) को व्यूह रचना का एक अहम हिस्सा माना है। केवल सामग्री प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों को उसे ग्रहण करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना व्यूह रचना का मुख्य कार्य है।

4. पॉल मुनरो (Paul Monroe) के अनुसार:

"शिक्षण व्यूह रचना वह युक्ति है जिसके द्वारा शिक्षक अपने शिक्षण कौशल और विषय-वस्तु के ज्ञान का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए छात्रों के अधिगम को अधिकतम सीमा तक ले जाता है।"


शिक्षण व्यूह रचना की प्रकृति एवं प्रमुख विशेषताएं

​परिभाषाओं के सूक्ष्म विश्लेषण के पश्चात् शिक्षण व्यूह रचना की प्रकृति (Nature) और विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

  • लक्ष्य-केंद्रित (Goal-Oriented): शिक्षण व्यूह रचना कभी भी उद्देश्यहीन नहीं होती। इसका निर्माण हमेशा किसी पूर्व-निर्धारित शैक्षिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। बिना लक्ष्य के रची गई व्यूह रचना दिशाहीन होती है।
  • लचीलापन और गत्यात्मकता (Flexibility and Dynamism): एक अच्छी व्यूह रचना कठोर या अपरिवर्तनीय नहीं होती। कक्षा की परिस्थितियों, छात्रों के प्रश्नों और उनके बौद्धिक स्तर के अनुसार शिक्षक अपनी व्यूह रचना में तुरंत बदलाव (Shift) कर सकता है। यह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है।
  • मनोवैज्ञानिक आधार (Psychological Basis): व्यूह रचना का निर्माण बाल मनोविज्ञान के सिद्धांतों पर होता है। इसमें छात्रों की आयु, रुचि, परिपक्वता, व्यक्तिगत विभिन्नताओं (Individual differences) और उनकी मानसिक क्षमता का पूरा ध्यान रखा जाता है।
  • समग्रता (Comprehensiveness): इसमें केवल पढ़ाना शामिल नहीं है। इसमें पाठ की प्रस्तावना से लेकर, प्रस्तुतीकरण, छात्रों की सहभागिता, अनुशासन बनाए रखना और अंत में मूल्यांकन करना— सब कुछ समाहित होता है।
  • कला और विज्ञान का संगम: व्यूह रचना का निर्माण करना एक 'विज्ञान' है क्योंकि यह मनोवैज्ञानिक नियमों पर आधारित है, लेकिन कक्षा में उसे सफलतापूर्वक लागू करना एक 'कला' (Art) है जो शिक्षक के अनुभव और कौशल पर निर्भर करती है।

शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रमुख प्रकार 

(Types of Teaching Strategies)

​शैक्षिक तकनीकी और शिक्षण प्रतिमानों (Teaching Models) के आधार पर शिक्षण व्यूह रचनाओं को मुख्य रूप से दो बड़े वर्गों में विभाजित किया गया है। यह विभाजन कक्षा में शिक्षक और छात्र के नियंत्रण और व्यवहार पर आधारित है:

1. प्रभुत्ववादी या निरंकुश व्यूह रचनाएं (Autocratic Teaching Strategies)

यह पारंपरिक शिक्षा प्रणाली पर आधारित व्यूह रचना है। इसमें संपूर्ण नियंत्रण शिक्षक के हाथों में होता है। शिक्षक ही सर्वेसर्वा (Dictator) होता है और छात्र केवल एक निष्क्रिय श्रोता (Passive listener) के रूप में कार्य करते हैं।

  • व्याख्यान व्यूह रचना (Lecture Strategy): इसमें शिक्षक विषय-वस्तु को मौखिक रूप से प्रस्तुत करता है। उच्च कक्षाओं और बड़े समूहों को कम समय में अधिक ज्ञान देने के लिए यह सबसे उपयोगी व्यूह रचना है।
  • प्रदर्शन व्यूह रचना (Demonstration Strategy): इसमें शिक्षक किसी प्रयोग या मॉडल को छात्रों के सामने प्रदर्शित करता है। विज्ञान के विषयों में यह बहुत कारगर है, जहाँ शिक्षक प्रयोग करके दिखाता है और छात्र देखते हैं।
  • अनुवर्ग शिक्षण (Tutorial Strategy): इसमें छात्रों को छोटे-छोटे समूहों में बांटकर उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान किया जाता है। यद्यपि इसमें ध्यान व्यक्तिगत होता है, लेकिन नियंत्रण शिक्षक का ही होता है।

2. प्रजातांत्रिक या जनतांत्रिक व्यूह रचनाएं (Democratic Teaching Strategies)

आधुनिक बाल-केंद्रित शिक्षा इसी व्यूह रचना पर आधारित है। इसमें शिक्षक और छात्र दोनों समान रूप से सक्रिय (Active) रहते हैं। शिक्षक एक मार्गदर्शक (Facilitator) की भूमिका निभाता है और छात्र अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं।

  • प्रश्नोत्तर व्यूह रचना (Socratic/Questioning Strategy): सुकरात द्वारा दी गई इस रणनीति में शिक्षक सीधे उत्तर नहीं देता, बल्कि प्रश्नों की एक शृंखला के माध्यम से छात्रों को स्वयं उत्तर तक पहुँचने के लिए प्रेरित करता है।
  • अन्वेषण या ह्यूरिस्टिक व्यूह रचना (Heuristic Strategy): इसके जन्मदाता आर्मस्ट्रांग (H.E. Armstrong) हैं। इस व्यूह रचना में छात्र को एक शोधकर्ता (Discoverer) की स्थिति में रख दिया जाता है। शिक्षक केवल एक समस्या देता है और छात्र प्रयोगों व तर्कों के आधार पर स्वयं उसका समाधान खोजते हैं।
  • विचार-मंथन व्यूह रचना (Brainstorming Strategy): ओसबोर्न (Osborn) द्वारा विकसित इस व्यूह रचना में छात्रों के सामने एक जटिल समस्या रखी जाती है और उन्हें बिना किसी रोक-टोक के अपने स्वतंत्र विचार प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है। यह रचनात्मकता (Creativity) विकसित करने की सर्वश्रेष्ठ रणनीति है।
  • परियोजना व्यूह रचना (Project Strategy): जॉन डीवी के प्रयोजनवाद (Pragmatism) पर आधारित और किलपैट्रिक द्वारा विकसित यह व्यूह रचना छात्रों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में कार्य करके सीखने (Learning by doing) का अवसर प्रदान करती है।

शिक्षण विधि (Teaching Method) और शिक्षण व्यूह रचना (Teaching Strategy) में अंतर

​अक्सर कई विद्यार्थी और शोधार्थी 'शिक्षण विधि' और 'शिक्षण व्यूह रचना' को एक ही मान लेते हैं, जबकि शैक्षिक तकनीकी की दृष्टि से इन दोनों में अत्यंत सूक्ष्म और स्पष्ट अंतर है। चूंकि यह विषय अत्यंत तकनीकी है, इसलिए इस अंतर को निम्नलिखित आधारों पर स्पष्ट किया जा सकता है:

उत्पत्ति और दृष्टिकोण के आधार पर:

  • 'शिक्षण विधि' की उत्पत्ति मुख्य रूप से 'शिक्षाशास्त्र' (Pedagogy) और शास्त्रीय दर्शन से हुई है। इसका दृष्टिकोण अत्यंत संकुचित (Micro) होता है। इसके विपरीत, 'शिक्षण व्यूह रचना' की उत्पत्ति सैन्य विज्ञान और आधुनिक शैक्षिक तकनीकी (Educational Technology) से हुई है। इसका दृष्टिकोण बहुत व्यापक (Macro) होता है।

उद्देश्यों के आधार पर:

  • शिक्षण विधि का मुख्य संबंध विषय-वस्तु (Content) को छात्रों तक पहुँचाने से होता है। इसका लक्ष्य केवल यह होता है कि 'पाठ को कैसे पढ़ाया जाए'। जबकि, व्यूह रचना का संबंध ज्ञानात्मक, भावात्मक और मनोगत्यात्मक— तीनों उद्देश्यों की प्राप्ति से होता है। यह बालक के संपूर्ण व्यवहार परिवर्तन पर केंद्रित होती है।

कार्यक्षेत्र के आधार पर:

  • विधि का कार्यक्षेत्र सीमित होता है। एक शिक्षण व्यूह रचना के अंदर कई शिक्षण विधियां शामिल हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक शिक्षक ने "प्रोजेक्ट व्यूह रचना" अपनाई है, तो उस प्रोजेक्ट को पूरा करने के दौरान वह 'व्याख्यान विधि', 'प्रदर्शन विधि' या 'चर्चा विधि' का प्रयोग कर सकता है। अतः, व्यूह रचना एक 'संपूर्ण इकाई' है और शिक्षण विधि उसका एक 'छोटा हिस्सा' है।

मापन और मूल्यांकन के आधार पर:

  • शिक्षण विधि में मूल्यांकन को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया जाता; पाठ समाप्त होने पर विधि का कार्य समाप्त हो जाता है। परंतु, व्यूह रचना तब तक समाप्त नहीं होती जब तक कि मूल्यांकन द्वारा यह सिद्ध न हो जाए कि पूर्व-निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लिए गए हैं। यदि परिणाम सही नहीं आते, तो शिक्षक अपनी व्यूह रचना में तुरंत परिवर्तन कर लेता है।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षण व्यूह रचना का महत्व 

  • ​उपर्युक्त  विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में "शिक्षण व्यूह रचना" शिक्षक का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है। आज का युग सूचनाओं के विस्फोट का युग है। छात्रों के पास ज्ञान प्राप्त करने के अनगिनत साधन उपलब्ध हैं। ऐसे में एक शिक्षक (विशेषकर उच्च शिक्षा में) की भूमिका केवल ज्ञान देने वाले की नहीं रह गई है, बल्कि वह एक 'रणनीतिकार' (Strategist) बन गया है।
  • ​बिना एक सुदृढ़ व्यूह रचना के कक्षा में प्रवेश करना, बिना दिशासूचक यंत्र (Compass) के समुद्र में जहाज उतारने के समान है। एक उत्कृष्ट शिक्षण व्यूह रचना न केवल छात्रों में विषय के प्रति गहन रुचि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करती है, बल्कि यह शिक्षक के समय, ऊर्जा और संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग भी सुनिश्चित करती है।
  • ​चाहे कोई शिक्षक कितना भी विद्वान क्यों न हो, यदि उसकी व्यूह रचना में त्रुटि है, तो वह कभी भी अपने छात्रों के मस्तिष्कों पर स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ सकता। अंततः, एक सफल और प्रभावशाली शिक्षक वही है जो अपनी कक्षा की नाड़ी को पहचानते हुए, उचित समय पर, उचित शिक्षण व्यूह रचना का चयन करता है और अपने छात्रों को सफलता के शिखर तक ले जाता है।         

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