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शैक्षिक तकनीकी shaikshik takniki

शैक्षिक तकनीकी (Educational Technology): 

अर्थ, स्वरूप, प्रकार और आधुनिक शिक्षा में इसकी उपयोगिता

​आधुनिक युग विज्ञान और तकनीकी का युग है। मानव जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जिसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी (Technology) ने प्रभावित न किया हो। हमारे उठने-बैठने, संचार करने, यात्रा करने और यहाँ तक कि सोचने के तरीकों में भी तकनीकी ने एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। ऐसे में, समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग— "शिक्षा"— तकनीकी के इस व्यापक प्रभाव से कैसे अछूता रह सकता था?


​शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान और तकनीकी के इसी व्यवस्थित और योजनाबद्ध प्रयोग ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया, जिसे हम "शैक्षिक तकनीकी" (Educational Technology) के नाम से जानते हैं। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली, जो केवल चॉक, डस्टर, ब्लैकबोर्ड और शिक्षक के व्याख्यान तक सीमित थी, आज स्मार्टबोर्ड, प्रोजेक्टर, ई-लर्निंग, कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तक पहुँच चुकी है।


​इस लेख में हम शैक्षिक तकनीकी के अर्थ, इसकी परिभाषाओं, विशेषताओं, इसके विभिन्न उपागमों (Approaches), कार्य-क्षेत्र और शिक्षा जगत में इसके अभूतपूर्व महत्व पर चर्चा करेंगे। 


शैक्षिक तकनीकी का शाब्दिक अर्थ 

(Literal Meaning of Educational Technology)

'शैक्षिक तकनीकी' शब्द मुख्य रूप से दो शब्दों के मेल से बना है— 'शैक्षिक' (Educational) और 'तकनीकी' (Technology)। इस अवधारणा को पूरी तरह से समझने के लिए हमें इन दोनों शब्दों के अर्थों को अलग-अलग समझना होगा:

शिक्षा (Education): शिक्षा शब्द संस्कृत की 'शिक्ष' धातु से बना है, जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना। अंग्रेजी में इसे 'Education' कहा जाता है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'Educatum', 'Educare' और 'Educere' शब्दों से मानी जाती है। इसका मूल अर्थ है— बच्चे की जन्मजात शक्तियों को बाहर निकालना और उसके व्यवहार में सकारात्मक और वांछित परिवर्तन लाना।


तकनीकी (Technology): तकनीकी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द 'Technikos' (टेक्निकोस) से हुई है, जिसका अर्थ होता है— "कला" (Art)। विज्ञान के नियमों, सिद्धांतों और वैज्ञानिक ज्ञान का व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करना ही तकनीकी है। यह कार्य को आसान, तेज और अधिक प्रभावी बनाने का विज्ञान है।

​अतः, जब हम इन दोनों शब्दों को मिलाते हैं, तो शैक्षिक तकनीकी का सरल अर्थ होता है— "शिक्षा की प्रक्रिया को सरल, सुगम, प्रभावी और रुचिकर बनाने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान, सिद्धांतों और उपकरणों का व्यवस्थित रूप से प्रयोग करना।"
​यहाँ यह स्पष्ट कर देना अत्यंत आवश्यक है कि शैक्षिक तकनीकी का अर्थ केवल शिक्षा में मशीनों (जैसे कंप्यूटर, टीवी, रेडियो) का प्रयोग करना नहीं है, बल्कि शिक्षण-अधिगम (Teaching-Learning) प्रक्रिया को मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर अधिक प्रभावशाली बनाना भी शैक्षिक तकनीकी का ही एक अहम हिस्सा है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई शैक्षिक तकनीकी की परिभाषाएं

​शैक्षिक तकनीकी के वास्तविक स्वरूप और इसकी गहराई को समझने के लिए विश्व के कई प्रमुख शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे परिभाषित किया है। इनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित हैं:
एस. एस. कुलकर्णी (S. S. Kulkarni) के अनुसार:"शैक्षिक तकनीकी, शिक्षण और अधिगम की प्रक्रियाओं में विज्ञान और तकनीकी के नियमों तथा आविष्कारों का प्रयोग है।"
"शैक्षिक तकनीकी, शिक्षण और अधिगम की प्रक्रियाओं में विज्ञान और तकनीकी के नियमों तथा आविष्कारों का प्रयोग है।"

  • जी. ओ. एम. लीथ (G. O. M. Leith) के अनुसार:"शैक्षिक तकनीकी अधिगम (सीखने) की परिस्थितियों में वैज्ञानिक ज्ञान का व्यवस्थित प्रयोग है, जिसके द्वारा शिक्षण और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में सुधार लाया जा सकता है।"

"शैक्षिक तकनीकी अधिगम (सीखने) की परिस्थितियों में वैज्ञानिक ज्ञान का व्यवस्थित प्रयोग है, जिसके द्वारा शिक्षण और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में सुधार लाया जा सकता है।"


  • रॉबर्ट ए. कॉक्स (Robert A. Cox) के अनुसार:"शैक्षिक तकनीकी का संबंध मानव के सीखने की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करने से है, जिसमें शिक्षण की विधियों, उपकरणों और सामग्रियों का मूल्यांकन किया जाता है।"

"शैक्षिक तकनीकी का संबंध मानव के सीखने की प्रक्रिया का व्यवस्थित अध्ययन करने से है, जिसमें शिक्षण की विधियों, उपकरणों और सामग्रियों का मूल्यांकन किया जाता है।"


  • ई. एम. बूटर (E. M. Buter) के अनुसार:"शैक्षिक तकनीकी, शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले विधियों, प्रविधियों और उपकरणों का एक व्यवस्थित विज्ञान है।"

"शैक्षिक तकनीकी, शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले विधियों, प्रविधियों और उपकरणों का एक व्यवस्थित विज्ञान है।"


  • शिव के. मित्रा (Shiva K. Mitra) के अनुसार:"शैक्षिक तकनीकी को उन पद्धतियों और प्रविधियों का विज्ञान माना जा सकता है, जिनके द्वारा शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।"

"शैक्षिक तकनीकी को उन पद्धतियों और प्रविधियों का विज्ञान माना जा सकता है, जिनके द्वारा शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।"


  • परिभाषाओं का निष्कर्ष: उपर्युक्त सभी परिभाषाओं का गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि शैक्षिक तकनीकी केवल 'हार्डवेयर' (मशीनों) का प्रयोग नहीं है, बल्कि यह मनोविज्ञान, विज्ञान और कला का एक ऐसा अद्भुत संगम है, जो शिक्षक के पढ़ाने के तरीके और छात्र के सीखने की क्षमता, दोनों में गुणात्मक सुधार लाता है।

शैक्षिक तकनीकी की प्रकृति एवं विशेषताएं 

(Nature and Characteristics)

शैक्षिक तकनीकी की प्रकृति अत्यंत वैज्ञानिक और व्यावहारिक है। इसकी प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:

  • वैज्ञानिक आधार (Scientific Basis): शैक्षिक तकनीकी पूरी तरह से विज्ञान और मनोविज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें जो भी शिक्षण विधियां या उपकरण प्रयोग किए जाते हैं, वे पूर्व-परीक्षित और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित होते हैं।
  • निरंतर विकासशील प्रक्रिया (Continuous Dynamic Process): तकनीकी कभी भी एक स्थान पर नहीं रुकती। जैसे-जैसे विज्ञान में नए आविष्कार होते हैं, शैक्षिक तकनीकी का स्वरूप भी बदलता रहता है। ब्लैकबोर्ड से लेकर आज के वर्चुअल रियलिटी (VR) तक का सफर इसकी विकासशील प्रकृति का ही प्रमाण है।

  • शिक्षण और अधिगम दोनों में सहायक: यह केवल शिक्षक के लिए ही नहीं, बल्कि विद्यार्थी के लिए भी समान रूप से उपयोगी है। जहाँ यह शिक्षक को अपनी बात प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में मदद करती है, वहीं यह छात्र को तेजी से और गहराई से सीखने में सहायता करती है।
  • व्यवहार में परिवर्तन (Change in Behavior): शैक्षिक तकनीकी का अंतिम लक्ष्य शिक्षार्थी के ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाना है।
  • व्यापकता (Comprehensiveness): शैक्षिक तकनीकी का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें पाठ्यक्रम के निर्माण से लेकर, शिक्षण विधियों के चयन, कक्षा के वातावरण के प्रबंधन और अंततः मूल्यांकन (Evaluation) की प्रक्रिया तक सब कुछ समाहित है।
  • मशीन और मनुष्य का समन्वय (Coordination of Machine and Human): यह केवल मशीनों पर निर्भर नहीं है। इसमें मशीन (हार्डवेयर) और मानव विचार (सॉफ्टवेयर) दोनों का संतुलित समन्वय होता है।

शैक्षिक तकनीकी के प्रमुख उपागम 

(Approaches of Educational Technology)


​प्रसिद्ध शिक्षाविद् लुम्सडेन (Lumsdaine) ने वर्ष 1964 में शैक्षिक तकनीकी को मुख्य रूप से तीन उपागमों (Approaches) में विभाजित किया था। शैक्षिक तकनीकी के संपूर्ण ढांचे को समझने के लिए इन तीनों उपागमों को समझना नितांत आवश्यक है:

1. कठोर शिल्प उपागम (Hardware Approach / Educational Technology-I)

​इसे शैक्षिक तकनीकी का पहला रूप माना जाता है। इस उपागम का जन्म भौतिक विज्ञान (Physics) और इंजीनियरिंग के सिद्धांतों से हुआ है। इसका मुख्य संबंध उन सभी भौतिक उपकरणों और मशीनों से है जिनका उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया जाता है। 
  • उदाहरण: रेडियो, टेलीविज़न, टेप-रिकॉर्डर, कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, स्मार्ट क्लासरूम के उपकरण आदि।
  • कार्य: इसका मुख्य कार्य ज्ञान को बड़े पैमाने पर संरक्षित करना (Preserve), प्रसारित करना (Transmit) और अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना है।

2. कोमल शिल्प उपागम (Software Approach / Educational Technology-II)

​यदि हार्डवेयर शरीर है, तो सॉफ्टवेयर उसकी आत्मा है। बिना कोमल शिल्प के, कठोर शिल्प केवल लोहे और प्लास्टिक का एक ढांचा मात्र है। इस उपागम का जन्म मनोविज्ञान (विशेषकर स्किनर के व्यवहारवादी मनोविज्ञान) से हुआ है। इसे "अनुदेशनात्मक तकनीकी" (Instructional Technology) भी कहा जाता है।अर्थ: इसमें शिक्षण के सिद्धांतों, सीखने के नियमों, पाठ्यक्रम निर्माण, और शिक्षण रणनीतियों (Teaching Strategies) का निर्माण किया जाता है।

  • उदाहरण: अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Instruction), शिक्षण प्रतिमान (Teaching Models), ग्राफ, चार्ट, किताबें, और कंप्यूटर के अंदर चलने वाले प्रोग्राम या सॉफ्टवेयर।
  • कार्य: इसका कार्य यह निर्धारित करना है कि मशीन के माध्यम से "क्या" पढ़ाया जाएगा और "कैसे" पढ़ाया जाएगा ताकि छात्र के व्यवहार में अधिकतम परिवर्तन लाया जा सके।

3.प्रणाली उपागम (Systems Approach / Educational Technology-III)

​यह शैक्षिक तकनीकी का सबसे आधुनिक और प्रबंधकीय (Managerial) रूप है। इसका जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य प्रबंधन से हुआ था। यह शिक्षा को एक पूरी "प्रणाली" (System) के रूप में देखता है।

  • अर्थ: प्रणाली उपागम शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को सुलझाने के लिए एक वैज्ञानिक और तार्किक तरीका प्रदान करता है। यह शिक्षा प्रशासन और प्रबंधन में अत्यंत उपयोगी है।
  • घटक: इसके तीन मुख्य घटक होते हैं— अदा (Input - जैसे छात्र और उनका पूर्व ज्ञान), प्रक्रिया (Process - शिक्षण विधियां और कक्षा का वातावरण), और प्रदा (Output - छात्रों के व्यवहार में आया अंतिम परिवर्तन या परीक्षा परिणाम)।
  • कार्य: यह सुनिश्चित करना कि शिक्षा प्रणाली का हर अंग (शिक्षक, छात्र, पाठ्यक्रम, प्रशासन) एक साथ मिलकर पूर्व-निर्धारित शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कुशलतापूर्वक कार्य कर रहा है।


शैक्षिक तकनीकी का कार्य-क्षेत्र 

(Scope of Educational Technology)

  • पाठ्यक्रम निर्माण (Curriculum Construction): छात्रों की आयु, उनकी मानसिक क्षमता और समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पाठ्यक्रम का निर्माण करना शैक्षिक तकनीकी का ही कार्य है।
  • शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का विश्लेषण (Analysis of Teaching-Learning Process): कक्षा में शिक्षक और छात्र के बीच होने वाली अंतःक्रिया (Interaction) का विश्लेषण करना। (जैसे— फ्लैंडर्स का अंतःक्रिया विश्लेषण प्रतिमान)।
  • शिक्षण विधियों और रणनीतियों का चयन: पाठ्यवस्तु की प्रकृति के अनुसार सही शिक्षण विधि (जैसे- व्याख्यान विधि, प्रदर्शन विधि, प्रोजेक्ट विधि) का चयन करना और उसका सफल क्रियान्वयन करना।
  • शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training): नए और सेवारत शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए शैक्षिक तकनीकी ने सूक्ष्म-शिक्षण (Micro-Teaching), अनुरूपित शिक्षण (Simulated Teaching) जैसी अत्यंत प्रभावी तकनीकों का विकास किया है।
  • मूल्यांकन और परीक्षण (Evaluation and Testing): केवल पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों ने कितना सीखा, इसकी सटीक जांच करना भी आवश्यक है। वस्तुनिष्ठ परीक्षण, ऑनलाइन परीक्षाएं, और ग्रेडिंग सिस्टम शैक्षिक तकनीकी की ही देन हैं।


वर्तमान समय और आधुनिक शिक्षा में शैक्षिक तकनीकी की उपयोगिता एवं महत्व

​आज की 21वीं सदी की शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से शैक्षिक तकनीकी पर निर्भर हो चुकी है। विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद, पूरी दुनिया ने शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी की अपरिहार्य आवश्यकता को महसूस किया है। इसकी उपयोगिता निम्नलिखित बिंदुओं से स्वतः स्पष्ट हो जाती है:

  • दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) का आधार: शैक्षिक तकनीकी के बिना पत्राचार या दूरस्थ शिक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जो छात्र नियमित रूप से विश्वविद्यालय नहीं जा सकते, वे ई-लर्निंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, मूक (MOOCs - Massive Open Online Courses) और इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
  • रुचिकर और स्थायी अधिगम: जब किसी अमूर्त (Abstract) विषय को 3D एनीमेशन या वीडियो के माध्यम से पर्दे पर दिखाया जाता है, तो छात्र उसे अत्यंत रुचि के साथ देखते हैं और वह ज्ञान उनके मस्तिष्क में स्थायी हो जाता है। "जो देखा जाता है, वह सुने गए से अधिक समय तक याद रहता है।"
  • व्यक्तिगत विभिन्नताओं का सम्मान (Respect for Individual Differences): कक्षा में हर छात्र के सीखने की गति अलग-अलग होती है। अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Learning) और कंप्यूटर आधारित शिक्षा ने छात्रों को अपनी गति (Self-pace) से सीखने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
  • जन-शिक्षा (Mass Education): पहले एक शिक्षक कक्षा में केवल 40-50 छात्रों को ही पढ़ा सकता था, लेकिन आज शैक्षिक तकनीकी (जैसे यूट्यूब या सैटेलाइट एजुकेशनल चैनल) के माध्यम से एक ही शिक्षक एक ही समय में लाखों छात्रों का मार्गदर्शन कर सकता है।
  • समय और ऊर्जा की बचत: स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल नोट्स के कारण शिक्षक को बार-बार ब्लैकबोर्ड पर लिखने में समय नष्ट नहीं करना पड़ता। इससे कक्षा का समय बचता है, जिसका उपयोग गंभीर चर्चाओं में किया जा सकता है।
  • शिक्षा में सार्वभौमिकता और समानता: तकनीकी ने ज्ञान को भौगोलिक सीमाओं से मुक्त कर दिया है। आज किसी दूरस्थ गांव में बैठा एक गरीब छात्र भी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों के व्याख्यान सुन सकता है।

शैक्षिक तकनीकी की सीमाएं और चुनौतियां 

(Limitations and Challenges)

​हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। यद्यपि शैक्षिक तकनीकी ने शिक्षा जगत में क्रांति ला दी है, परंतु इसके अंधानुकरण से कुछ गंभीर चुनौतियां भी उत्पन्न हुई हैं:

  • मानवीय स्पर्श का अभाव (Dehumanization of Education): शिक्षा केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है; यह शिक्षक और छात्र के बीच का एक आत्मीय और भावनात्मक संबंध है। मशीनें कभी भी शिक्षक के प्रेम, सहानुभूति और प्रेरणा का स्थान नहीं ले सकतीं। अत्यधिक तकनीकी ने शिक्षा को यंत्रीकृत (Mechanical) कर दिया है।
  • आर्थिक बाधाएं (High Cost): शैक्षिक तकनीकी के उपकरण (कंप्यूटर, स्मार्टबोर्ड, हाई-स्पीड इंटरनेट) अत्यंत महंगे होते हैं। विकासशील देशों के हर ग्रामीण विद्यालय के लिए इन्हें वहन करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
  • डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): तकनीकी ने समाज को दो वर्गों में बांट दिया है— एक जिनके पास आधुनिक तकनीकी की पहुंच है और दूसरे जो इससे वंचित हैं। इससे शैक्षिक असमानता बढ़ी है।
  • प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी: हमारे पास उन्नत तकनीकी तो आ गई है, लेकिन आज भी बहुतायत में ऐसे शिक्षक हैं जिन्हें इन उपकरणों को चलाने का उचित प्रशिक्षण नहीं मिला है। एक अप्रशिक्षित शिक्षक के हाथ में तकनीकी का कोई मूल्य नहीं है।
  • अनुशासनहीनता और ध्यान भटकाव: इंटरनेट और मोबाइल फोन के शैक्षिक उपयोग के साथ-साथ छात्रों का ध्यान सोशल मीडिया और अनुचित सामग्री की ओर भटकने का खतरा हमेशा बना रहता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

​विस्तृत विवेचन के उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शैक्षिक तकनीकी आधुनिक शिक्षा प्रणाली का हृदय बन चुकी है। यह शिक्षा को एक बंद कमरे से निकालकर अनंत आकाश तक ले जाने का एक सशक्त माध्यम है। शैक्षिक तकनीकी ने शिक्षा को अधिक वैज्ञानिक, प्रभावी, बोधगम्य और सर्वसुलभ बना दिया है ​परंतु, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि तकनीकी केवल एक "साधन" (Means) है, "साध्य" (End) नहीं। कंप्यूटर या कोई भी रोबोट कभी भी एक वास्तविक और प्रेरणादायक शिक्षक का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। शिक्षक का मार्गदर्शन और तकनीकी की शक्ति— जब ये दोनों मिलते हैं, तभी शिक्षा अपने वास्तविक और सर्वोच्च उद्देश्य को प्राप्त कर पाती है। 
​अतः, भविष्य की शिक्षा प्रणाली उसी देश की सर्वश्रेष्ठ होगी जो तकनीकी के नवीनतम उपकरणों के साथ-साथ शिक्षा के मानवीय और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने में सफल होगा। अंत में एक प्रसिद्ध कथन के साथ इस लेख को विराम देना उचित होगा—

"तकनीकी कभी भी शिक्षकों की जगह नहीं लेगी, लेकिन जिन शिक्षकों के हाथ में तकनीकी होगी, वे उन शिक्षकों की जगह अवश्य ले लेंगे जिनके पास तकनीकी नहीं है।"

​इस प्रकार, शैक्षिक तकनीकी शिक्षा जगत के लिए एक वरदान है, बशर्ते इसका प्रयोग विवेकपूर्ण, उद्देश्यपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए किया जाए।

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